महबूब
हो के तेरा!
जाना कि ये
मैं नहीं..तुम हूँ।
न सोया न जागा
सरोबोर जानें कैसी
मस्ती में गुम हूँ।।
था एक पल में
अधूरा तेरे बिन,
दूजे ही पल के
एहसास ने माना
ये दिल में तेरी ही
तो धड़कन हूँ।।
बस गए हो तुम..
ही सांसों में मेरी,
और हो रहा हूँ मैं
खाली रफ्ता-रफ्ता..
नहीं फिर भी..
कहीं अब कम हूँ।।
कुछ और करीब
हो गया हूँ सुनकर
ये 'मैं' नहीं, ये‘तुम’नहीं..
तुझमें घुलने से-
तराने की बजी मधुर जो
वहीं अब 'हम' की ‘धुन’ हूँ।।
डाॅ. कंचन मखीजा
हरियाणा, भारत

