"वोट नहीं तो शिकायत कैसी" - प्रिया श्रीवास्तव
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इस लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव है - मतदान। हर पाँच साल में हमें यह अवसर मिलता है कि हम अपना प्रतिनिधि चुनें जो हमारे लिए नीतियां बनाए और देश चलाए। मतलब हमारा एक वोट देश बदलने की ताकत रखता है अगर हम अपने मताधिकार का प्रयोग ही नहीं करेंगे, तो बाद में सरकार या व्यवस्था को दोष देने का हमें कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
अक्सर हम यह सोचते हैं कि "मेरे एक वोट से क्या होगा?" लेकिन इतिहास गवाह है कि कई चुनाव कुछ वोटों से ही हारे या जीते गए हैं।
1999 में एक वोट से ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई थी।
2008 में राजस्थान विधानसभा की एक सीट मात्र एक वोट से तय हुई थी। यानी एक वोट सरकार बना भी सकता है और गिरा भी सकता है। जब लाखों लोग "एक वोट से क्या होगा" सोचकर घर बैठ जाते हैं, तो अयोग्य उम्मीदवार आसानी से जीत जाते हैं।
जब जागरूक और पढ़े-लिखे लोग वोट नहीं देते, तो मतदान का प्रतिशत गिर जाता है। कम मतदान का फायदा अक्सर उन लोगों को मिलता है जो जाति, धर्म या पैसे के बल पर चुनाव लड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि संसद और विधानसभाओं में ऐसे प्रतिनिधि चुन लिए जाते हैं जिनकी प्राथमिकता विकास नहीं, अपना स्वार्थ होता है। फिर हम अगले पाँच साल तक सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार को लेकर शिकायत करते रहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब बदलाव लाने का मौका था, तब हम कहाँ थे?
संविधान ने हमें वोट का अधिकार दिया है, लेकिन यह हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य भी है। अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिर्फ अधिकार मांगना और कर्तव्य से मुंह मोड़ लेना यह तो स्वार्थपरता है। जिस तरह हम साफ सड़क, अच्छी नौकरी और सुरक्षा की उम्मीद रखते हैं, उसी तरह देश हमसे एक ईमानदार वोट की उम्मीद रखता है।
वोट देना ही काफी नहीं है, सही व्यक्ति को वोट देना ज़रूरी है। हमें उम्मीदवार की शिक्षा, उसका पिछला काम, उसकी सोच और उसके इरादे देखकर वोट देना चाहिए। जाति, धर्म, मुफ्त की योजनाओं या 500-1000 रुपये के लालच में दिया गया वोट अगले पाँच साल तक हमें रुलाता है। याद रखें, बिकने वाला वोट कभी विकास नहीं खरीद सकता।
भारत में 18 साल से ऊपर के 50 करोड़ से ज्यादा युवा मतदाता हैं। अगर युवा ठान लें तो देश की तस्वीर बदल सकती है। लेकिन दुख की बात है कि सबसे कम मतदान युवा वर्ग में ही होता है। छुट्टी वाले दिन घूमना, रील बनाना या "पॉलिटिक्स बेकार है" कहकर दूर रहना फैशन बन गया है। युवाओं को समझना होगा कि पॉलिटिक्स से दूर रहकर आप गलत पॉलिटिक्स का शिकार बनते हैं।
"जब आप गलत को गलत नहीं कहते तब आप उसे सही कहते हैं।"
जब चुनाव आएं, तो आलस छोड़कर सबसे पहले बूथ पर जाएं। अपने परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों को भी वोट देने के लिए प्रेरित करें। क्योंकि जैसा देश आप चाहते हैं, वो तभी बनेगा जब आप वोट देंगे। वरना महंगाई, बेरोजगारी या भ्रष्टाचार पर शिकायत करना आपको शोभा नहीं देगा।
हमें याद रखना चाहिए की लोकतंत्र को मजबूत करना है तो वोट देना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
इन्हीं सब उद्देशों को ध्यान में रखकर 'इंडिया वन फाउंडेशन' और 'पुलिस पब्लिक प्रेस' (दिल्ली) द्वारा एक जन जागरूकता सम्मेलन का आयोजन कोलकाता के 'भारतीय भाषा परिषद' में 12 अप्रैल 2026 (रविवार) को सुबह 11 बजे आयोजित किया जाएगा l

