गांधी की याद में खड़ा गांधी कुटीर, अब खुद मांग रहा उद्धार
1918 में सारण पहुंचे थे बापू, मलखाचक में गूंजती थी चरखे की आवाज; कभी 400 करघों से स्वदेशी को मिली थी ताकत, आज जर्जर गांधी कुटीर पर साल में एक दिन चढ़ते हैं फूल:
सारण की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और गौरवशाली धरती पर गांधी की अहिंसक विचारधारा और क्रांतिकारी धारा की स्मृतियां यही मलखाचक की ऐतिहासिक विशिष्टता:
✍️ संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी
जिस धरती ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की, जिस गांव में चरखे और करघे स्वदेशी आंदोलन की ताकत बने और जहां महात्मा गांधी के कदम पड़े, उसी धरती पर आज गांधी की स्मृति संरक्षण की बाट जोह रही है। सारण जिले के दिघवारा प्रखंड अंतर्गत मलखाचक स्थित गांधी कुटीर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कभी राष्ट्रवादी चेतना और खादी आंदोलन का प्रमुख केंद्र रहा यह स्थल आज बदहाली की कहानी कह रहा है। गांधी जयंती पर हर वर्ष यहां सरकारी और राजनीतिक गतिविधियां होती हैं। माल्यार्पण होता है, गांधीजी को याद किया जाता है और उनके विचारों को आत्मसात करने की बातें कही जाती हैं। लेकिन कार्यक्रम समाप्त होते ही जैसे गांधी कुटीर भी भुला दिया जाता है। जनप्रतिनिधियों के आने-जाने के बीच ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण का सवाल वहीं खड़ा रह जाता है। सवाल सिर्फ एक भवन की बदहाली का नहीं है। बल्कि सवाल उस इतिहास के संरक्षण का है, जिसने सारण को स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रीय मानचित्र पर पहचान दिलाई।
सारण की ऐतिहासिक धरती पर 1918 में बापू का हुआ था आगमन:
सारण का स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव पुराना और गहरा रहा है। चंपारण सत्याग्रह के दौर में भी जिले के लोगों ने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। मौलाना मजहरुल हक, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और ब्रजकिशोर प्रसाद जैसे नेताओं की सक्रियता ने बिहार में राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूत आधार दिया। इसी ऐतिहासिक दौर में 1918 में महात्मा गांधी सारण पहुंचे थे। इसके बाद असहयोग आंदोलन और अंग्रेजी शासन के विरोध की गतिविधियों में सारण की भागीदारी और तेज हुई। 1919 के रॉलेट एक्ट के विरोध से लेकर असहयोग आंदोलन तक यहां के लोगों ने आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई। सारण की जनता में राष्ट्रवादी चेतना किस कदर गहरी थी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां के लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रतिरोध को अपनी सामाजिक चेतना का हिस्सा बना लिया था।
‘ना लगान देहब, ना जमीन छोड़ब’ की धरती:
सारण की मिट्टी पर वीर कुंवर सिंह की क्रांतिकारी परंपरा का भी प्रभाव रहा। भोजपुरिया समाज में उनके संघर्ष और स्वाभिमान की गहरी छाप थी। अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रतिरोध की यही भावना आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन में भी दिखाई दी। वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के छपरा आगमन के दौरान उनके स्वागत में प्राचार्य मनोरंजन द्वारा रचित गीत ‘फिरंगिया’ का उल्लेख भी स्थानीय इतिहास में मिलता है। यह सिर्फ एक गीत नहीं था, बल्कि उस समय के जनमानस में अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध और स्वदेशी चेतना की अभिव्यक्ति थी।
मलखाचक में 400 करघों से चल रहा था खादी आंदोलन:
दिघवारा का मलखाचक गांधीवादी विचार और राष्ट्रवादी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। गांधी कुटीर के आसपास खादी आंदोलन ने ऐसी गति पकड़ी कि यहां और आसपास के गांवों में बड़ी संख्या में करघे चलने लगे। करीब 400 करघों का संचालन होने की बात कही जाती है। चरखा और करघा उस समय महज रोजगार का साधन नहीं थे। बल्कि वह अंग्रेजी शासन की आर्थिक व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन चुके थे। विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने के संदेश को घर- घर पहुंचाने में खादी आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। स्वतंत्रता सेनानी बाबू राम विनोद सिंह, डॉ. सत्यनारायण तथा वीरांगना शारदा और सरस्वती जैसे लोगों ने मलखाचक में इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। यहां तैयार होने वाली खादी की पहचान स्थानीय सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची। कानपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में मलखाचक की खादी का प्रदर्शन भी हुआ। महात्मा गांधी से जुड़े मलखाचक के प्रसंग का उल्लेख केएम मुंशी की पुस्तक थ्री मंथ्स ऑफ महात्मा गांधी में भी मिलता है। 1934 में गांधीजी के मलखाचक आने की चर्चा भी इसी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है।
भगत सिंह के आने की भी रही चर्चा:
मलखाचक की कहानी केवल गांधीजी तक सीमित नहीं है। स्थानीय इतिहास में सरदार भगत सिंह के भी यहां आने का उल्लेख मिलता है। साइमन कमीशन के विरोध में जनजागरण के दौरान उनके मलखाचक आने की चर्चा होती है। भगत सिंह और क्रांतिकारी योगेंद्र शुक्ल के बीच कुश्ती का प्रसंग भी स्थानीय स्मृतियों में दर्ज है। बताया जाता है कि इसी दौरान भगत सिंह ने सारण की जनता के आंदोलनकारी तेवर को महसूस किया था। यानी एक ही धरती पर गांधी की अहिंसक विचारधारा और क्रांतिकारी धारा की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। यही मलखाचक की ऐतिहासिक विशिष्टता है।
1950 में बना गांधी कुटीर, अब संरक्षण की जरूरत:
महात्मा गांधी की स्मृति को जीवित रखने के लिए स्वतंत्रता के बाद 1950 में गांधी कुटीर का निर्माण कराया गया। लंबे समय तक यह स्थल स्वतंत्रता सेनानियों, उनके परिजनों और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। लेकिन धीरे- धीरे इसकी चमक फीकी पड़ती गई। आग से क्षतिग्रस्त हुए गांधी कुटीर का अपेक्षित जीर्णोद्धार नहीं हो सका। जिन हाथों ने इसे आंदोलन की स्मृति के रूप में संभाला, वह भी अब नहीं रहे। डॉ. सत्यनारायण के निधन के बाद इस स्थल की देखरेख और संरक्षण की जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। रामविनोद सिंह के पुत्र जनार्दन सिंह और डॉ. सुरेंद्र के जीवनकाल तक भी गांधी कुटीर से जुड़ी गतिविधियों और स्मृतियों को जीवंत रखने का प्रयास होता रहा। वीरांगना शारदा और सरस्वती जैसी हस्तियां भी अब इतिहास का हिस्सा हैं।
खादी का नारा बचा, खादी की विरासत खो गई:
विडंबना यह है कि गांधीजी के नाम पर आज भी स्वदेशी और खादी के नारे लगाए जाते हैं, लेकिन सारण में कभी खादी आंदोलन की रीढ़ रहे चरखे और करघे अब दिखाई नहीं देते। खादी ग्रामोद्योग की वह पुरानी संस्कृति भी कमजोर पड़ गई है। दिघवारा का गांधी चबूतरा हो या बगही का गांधी मैदान, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी स्मृतियों के संरक्षण का सवाल कई जगह दिखाई देता है। प्रखंड मुख्यालय पर स्वतंत्रता सेनानियों के नामों को संरक्षित करने की जरूरत भी लंबे समय से महसूस की जाती रही है। सोनपुर में स्वतंत्रता सेनानी शिववचन सिंह, नयागांव में शहीद राजेंद्र सिंह और दिघवारा में रामविनोद सिंह की प्रतिमाएं स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों को जीवित रखने का प्रयास हैं। मढ़ौरा की वीरांगना रामसरूपा देवी भी इसी विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
गांधी जयंती पर फूल नहीं, संरक्षण चाहिए:
गांधी कुटीर की बदहाली सिर्फ एक ऐतिहासिक भवन की समस्या नहीं है। यह उस स्मृति की चिंता है, जिसके सहारे नई पीढ़ी अपने अतीत को समझ सकती है। हर साल गांधी जयंती पर यहां दो फूल चढ़ाने से इतिहास सुरक्षित नहीं होगा। जरूरत है गांधी कुटीर के जीर्णोद्धार की, इसके इतिहास का दस्तावेजीकरण करने की और इसे ऐसी जगह के रूप में विकसित करने की, जहां बच्चे और युवा स्वतंत्रता आंदोलन, गांधी के विचार, स्वदेशी और खादी के इतिहास को करीब से समझ सकें। जिस मलखाचक से कभी चरखे की आवाज दूर तक सुनाई देती थी, वहां आज खामोशी है। गांधी की स्मृति में बने इस कुटीर को अब किसी भाषण की नहीं, बल्कि संरक्षण की जरूरत है। गांधी जयंती पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम गांधी को सिर्फ तस्वीर और माल्यार्पण तक याद रखेंगे, या उनकी विरासत को भी बचाएंगे।
Gandhi Kutir Malkhachak, Malkhachak Gandhi Kutir, Gandhi Jayanti 2026, Saran News, Chhapra News, Dighwara News, Bihar News, Mahatma Gandhi Saran, Gandhi in Saran, Malkhachak history, Khadi movement in Bihar, Swadeshi movement Saran, Gandhi heritage Bihar, freedom movement Saran, Gandhi Kutir condition, Malkhachak historical place, Saran freedom struggle, Gandhi Jayanti news, Bihar historical places, Jagat Darshan News

