..….ज्ञानी कहलाई
घास के रंग बा हरियर काहे, हवा काहे ना लउकेला...
के बारल जोन्ही के बाति,जानेला मानवा छउकेला...
चिरई कइसे मान बनावे, बोलो ओझा गुनी....
गछिया काहे रहेला रुकल, केहु कहे हम सूनी
इंद्रधनुष में रंग चढ़ावल, के बा अइसन ज्ञानी
घाटा के लटकावल घुमत, कहऽ बिजेन्द्र बखानी
चांद के साइज बढ़े घाटेला, बाकी काहवाँ भाग बा
जे भी एकर मरम बुझाई, ओकरे निमन राग बा
सुनऽ बिजेन्दर हरि के लीला, हरि के भक्त बताई
जे भी मरम बताई एकर, उ ज्ञानी कहलाई।
✍️बिजेन्द्र कुमार तिवारी
बिजेन्दर बाबू
7250299200

