विरोध के नए तरीके से समाज को हानि, जान जोखिम में डालकर विरोध जताना उचित नहीं
सोमवार की शाम बनियापुर के एक गांव में एक बार फिर एक युवती मोबाइल टॉवर पर चढ़ गई। यह बनियापुर में दूसरी घटना है। सारण जिले में बीते दो माह में पांच ऐसे मामले सामने आए हैं। अपनी मांगों या समस्याओं को लेकर महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर असामान्य तरीके से विरोध दर्ज कराते हुए दिखती रही हैं। कभी कोई महिला बिजली के टावर पर चढ़ जाती है तो कभी मोबाइल टावर पर। ऐसे घटनाक्रम समाज को सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि आखिर यह महिलाओं की स्वतंत्र सोच और साहस का प्रतीक है या अपनी बात मनवाने का एक नया तरीका?
भारतीय समाज में महिलाओं को सदियों से त्याग, धैर्य और मर्यादा की प्रतिमूर्ति माना जाता रहा है। परिवार और समाज की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए वे अपने दुख-दर्द को भी अक्सर सीमित दायरे में ही व्यक्त करती थीं, कुछ महिलाएं आज भी इसका निर्वहन कर रही हैं। लेकिन समय के साथ समाज में व्यापक परिवर्तन आया है। शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और कानूनी अधिकारों ने महिलाओं को अपनी बात खुलकर रखने का आत्मविश्वास दिया है। अब वे केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या अपनी मांगों को मनवाने के लिए ऐसे जोखिमपूर्ण तरीकों का सहारा लेना उचित है? किसी टावर पर चढ़ जाना या अपनी जान को खतरे में डाल देना न तो लोकतांत्रिक विरोध का आदर्श तरीका है और न ही समाज के लिए सकारात्मक संदेश देता है। इससे न केवल संबंधित व्यक्ति की सुरक्षा खतरे में पड़ती है, बल्कि प्रशासनिक संसाधनों का भी बड़ा हिस्सा ऐसे संकट को संभालने में लग जाता है।
दूसरी ओर, इन घटनाओं के पीछे छिपी सामाजिक परिस्थितियों को भी समझना आवश्यक है। कई बार लोग तब ऐसे कदम उठाते हैं जब उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। यदि प्रशासनिक व्यवस्था समय पर शिकायतों का समाधान करे और समाज संवाद की संस्कृति को मजबूत बनाए, तो शायद ऐसी नौबत ही न आए।
महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों का निर्वहन भी है। सशक्तिकरण का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति जोखिम उठाकर अपनी बात मनवाने का प्रयास करे, बल्कि यह है कि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो, तर्क और संवाद के माध्यम से अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सके। यही बात पुरुषों पर भी समान रूप से लागू होती है।
आज आवश्यकता महिलाओं और पुरुषों के बीच तुलना करने की नहीं, बल्कि बदलते समाज को समझने की है। यदि महिलाएं अधिक मुखर हुई हैं तो यह सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। लेकिन इस परिवर्तन को सकारात्मक दिशा देना भी उतना ही जरूरी है। विरोध का अधिकार लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु उसकी अभिव्यक्ति ऐसी होनी चाहिए जो समाज, कानून और मानव जीवन की गरिमा के अनुरूप हो। अंततः टावर पर चढ़ने जैसी घटनाओं को महिला सशक्तिकरण का अंतिम चरण नहीं कहा जा सकता। जान जोखिम में डालकर विरोध जताने की मजबूरी किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।


