“एक पेड़ इस मां धरा पे तभी प्रकृति चहकेगी, हम महकेंगे”
हिंदी महिला समिति का भावनात्मक पर्यावरण दिवस कार्यक्रम बना आकर्षण का केंद्र
नागपुर (महाराष्ट्र): पर्यावरण दिवस के अवसर पर हिंदी महिला समिति द्वारा आयोजित एक भावनात्मक एवं काव्यमय कार्यक्रम ने सभी के हृदय को स्पर्श कर लिया। “एक पेड़ इस मां धरा पे तभी प्रकृति चहकेगी, हम महकेंगे” विषय पर आधारित यह आयोजन गीत, कविता, नृत्य और विचारों के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का संदेश देने वाला प्रेरणादायक मंच बन गया। कार्यक्रम में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, मानव की जिम्मेदारी और प्रकृति के महत्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था अध्यक्ष रति चौबे, नागपुर द्वारा प्रकृति संरक्षण पर आधारित मार्मिक पंक्तियों से हुआ। उन्होंने कहा कि “मानव स्वयं प्रकृति के लिए काल बन गया है।” इसके बाद भगवती पंत ने धरती को मां के रूप में प्रस्तुत करते हुए भावपूर्ण गीत गाया। गार्गी जोशी ने मानव और विधाता के संबंधों पर अपने विचार रखते हुए प्रकृति के प्रति बढ़ते उपेक्षापूर्ण रवैये पर चिंता व्यक्त की।
सुषमा शर्मा ने पर्यावरण को जीवन का सच्चा मित्र बताते हुए उससे जुड़ने का संदेश दिया, वहीं सुरेखा खरे ने अपने छंद गीत के माध्यम से प्रकृति की पीड़ा को स्वर दिया। प्रसिद्ध नृत्यांगना छवि चक्रवर्ती ने प्रकृति गीत पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत कर वातावरण को भावमय बना दिया। उनकी प्रस्तुति पर सभागार तालियों से गूंज उठा।
ऑस्ट्रेलिया से विशेष अतिथि के रूप में जुड़ीं प्रसिद्ध लेखिका एवं कवयित्री सुनीता शर्मा ने कहा कि प्रकृति तभी मुस्कुराएगी जब हमारी संवेदनाएं कर्म में परिवर्तित होंगी। डॉ. कविता परिहार ने विश्वास और प्रकृति के संबंध पर गहरी बात कहते हुए कहा कि “विश्वास हो तो मरुस्थल में भी जल हो सकता है।” निवेदिता पाटनी ने पर्वतों और नदियों के माध्यम से प्रकृति की जीवनदायिनी शक्ति को दर्शाया।
कार्यक्रम में लक्ष्मी वर्मा द्वारा प्रस्तुत पर्यावरण विषयक नृत्य, रेखा तिवारी का गीत “हे मानव तू प्रकृति से यूं खिलवाड़ कर क्या पावेगा” तथा मेलबोर्न से जुड़ीं साहित्यकार सुमन जैन के विचार विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। उन्होंने पर्यावरण को आत्मा का विस्तार बताते हुए इसे केवल खैरात नहीं, बल्कि जिम्मेदारी बताया।
माधुरी यादव, अपराजिता, गीता शर्मा, अनिता गायकवाड़, निधि अवस्थी, पूनम मिश्रा, मंजू पंत, ममता विश्वकर्मा, वर्षा, रूबी दास और अर्चना सहित अनेक प्रतिभागियों ने गीत, कविता और नृत्य के माध्यम से कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। कार्यक्रम की तीसरी विशेष अतिथि मुंबई की साइकोलॉजिस्ट डॉ. अलका चौबे ने पर्यावरण को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाते हुए कहा कि प्रकृति से जुड़ाव मानसिक संतुलन और सकारात्मकता का आधार है।
कार्यक्रम के अंत में संस्था की उपाध्यक्ष एवं होस्ट रेखा पांडेय ने आभार व्यक्त किया। अध्यक्ष रति चौबे एवं कोषाध्यक्ष ममता विश्वकर्मा ने सभी प्रतिभागियों के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया। सभी ने एक स्वर में गाया—
“आओ करें आज सभी एक संकल्प,
अपनी सोच को बदलें, प्रवृत्ति बदलें,
एक पेड़ इस धरा के नाम लगाकर,
तभी तन महकेगा, मन चहकेगा।”
यह कार्यक्रम संवेदनशीलता, नवीनता, साहित्य, संगीत और पर्यावरण चेतना का अद्भुत संगम साबित हुआ। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण प्रकृति के रूप में प्रस्तुत गीता शर्मा की सजीव प्रस्तुति रही, जिसने पूरे आयोजन को विशेष ऊंचाई प्रदान की।
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