कर्नाटक में हिंदी का भविष्य- शिक्षा, समन्वय और रोजगार पर गहराता संकट
कर्नाटक की धरती हमेशा से समन्वय और सद्भाव की साक्षी रही है। यहाँ बाहर से आकर रहने वाले लोग, चाहे वे उच्च पदों पर आसीन हों या श्रमिक के रूप में कार्यरत हों, वे स्थानीय संस्कृति और कन्नड़ भाषा को प्रेमपूर्वक अपनाते हैं। सीखने की यह प्रक्रिया स्वेच्छा और सम्मान पर आधारित होती है। ऐसे में हिंदी के प्रति इस प्रकार का नकारात्मक दृष्टिकोण समझ से परे है। हाल ही में हुए समाचार पत्रों के सर्वेक्षण और रुझान बताते हैं कि बड़ी संख्या में छात्रों और अभिभावकों ने अपनी इच्छा से हिंदी विषय को चुना है। यह स्पष्ट करता है कि किसी भी भाषा के प्रति जनता की रुचि को प्रशासनिक निर्णयों से दबाया नहीं जा सकता।
शिक्षा का मूल उद्देश्य विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास है। जब कोई छात्र कई भाषाएँ जानता है, तो उसमें न केवल आत्मविश्वास बढ़ता है बल्कि उसके कौशल (Skill) में भी निखार आता है। बहुभाषी होना सफलता के नए रास्ते खोलता है। भाषाएँ कभी एक-दूसरे पर हावी नहीं होतीं और न ही एक-दूसरे का रास्ता काटती हैं, बल्कि वे तो समाज को जोड़ने वाले सेतु का काम करती हैं। हिंदी को केवल ग्रेडिंग तक सीमित कर देना उन छात्रों के साथ अन्याय है जो इसे एक करियर विकल्प और राष्ट्रीय स्तर पर संवाद के माध्यम के रूप में देखते हैं। विशेष रूप से जो विद्यार्थी भविष्य में यूपीएससी या अन्य अंतर-राज्यीय नौकरियों की तैयारी करना चाहते हैं, उनके लिए यह निर्णय एक बड़ी बाधा बन सकता है।
इस निर्णय का सबसे भयावह पक्ष उन शिक्षकों की स्थिति है जो वर्षों से हिंदी पढ़ा रहे हैं। जब विषय की महत्ता कम होती है, तो शिक्षण संस्थानों में उस विषय के प्रति उदासीनता बढ़ती है, जिसका सीधा असर शिक्षकों की नौकरियों और भविष्य की नियुक्तियों पर पड़ता है। हजारों योग्य शिक्षक आज असुरक्षा के साये में हैं। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों के व्यापक हित, अभिभावकों की पसंद और शिक्षकों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा को देखते हुए इस निर्णय पर तत्काल पुनर्विचार करे। शिक्षा में अंकों की अनिवार्यता ही विषय की गंभीरता को बनाए रखती है, अतः हिंदी को उसका पूर्ववत स्थान और सम्मान मिलना ही न्यायसंगत होगा।
राष्ट्रभाषा हिन्दी के अस्तित्व से छेड़छाड़ कर उसे भारत भूखंड में मृत्युशैया पर लिटाने की इच्छा रखने वाली सरकारों और शासन का कड़ा प्रतिरोध कीजिए। तमाम स्थितियों- परिस्थितियों के मद्देनजर व्यापक रूप से इसे फैलाने की मुहिम छेड़ दीजिए।भारत की भाषायी संस्कृति पर आक्रमण करने के पीछे की मंशा को बेनकाब कीजिए और लिखिए कि सांस्कृतिक एकता को खंडित करना किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं है।
किसी भी प्रदेश की प्रगति उसकी समावेशी शिक्षा नीति पर निर्भर करती है, लेकिन कर्नाटक सरकार द्वारा हाल ही में पीयूसी (PUC) स्तर पर हिंदी विषय के अंकों को मार्ककार्ड में न जोड़कर केवल ‘ग्रेड’ देने का जो निर्णय लिया गया है, वह अत्यंत चिंताजनक है। शिक्षा के क्षेत्र में लिया गया यह फैसला केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह उन हजारों विद्यार्थियों के भविष्य और उन शिक्षकों की जीविका पर सीधा प्रहार है जिन्होंने अपना जीवन इस भाषा के अध्यापन में समर्पित कर दिया है।
सामयिक आलेख संकलनकर्ता: धर्मेंद्र रस्तोगी (स्वतंत्र पत्रकार)



