बिहार के सिकलीगढ़ धरहरा में आस्था का महासंगम-
खंभा फाड़कर जहाँ प्रकट हुए भगवान नरसिंह, राजकीय सम्मान से हुआ होलिका दहन
केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण
पूर्णिया ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर: मंत्री लेसी सिंह
✍️ धर्मेंद्र रस्तोगी
बिहार के पूर्णिया जिलांतर्गत बनमनखी अनुमंडल स्थित सिकलीगढ़ धरहरा गांव में सोमवार की देर संध्या आस्था, परंपरा और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला। ऐसी मान्यता है कि यही वह पावन भूमि है, जहां भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान नरसिंह खंभा फाड़कर प्रकट हुए थे। इसी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के कारण यहां आयोजित राजकीय होलिका दहन महोत्सव में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। प्रह्लाद स्तंभ परिसर में करीब एक लाख से अधिक लोगों की उपस्थिति ने इस आयोजन को भव्य और ऐतिहासिक बना दिया।
कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा आयोजित इस राजकीय महोत्सव का विधिवत उद्घाटन बिहार सरकार की खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री लेशी सिंह और बनमनखी विधायक कृष्ण कुमार ऋषि ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस अवसर पर मंत्री लेशी सिंह ने कहा कि यह केवल पूर्णिया ही नहीं, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है। उन्होंने कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण और विकास के लिए प्रतिबद्ध है। विधायक कृष्ण कुमार ऋषि ने सिकलीगढ़ धरहरा को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर और सशक्त रूप से स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यहां के कण- कण में भगवान नरसिंह की आस्था रची- बसी है और अनेक पुरातात्विक साक्ष्य इसकी पुष्टि करते हैं।
मंत्रोच्चार और वैदिक विधि- विधान के बीच जैसे ही विशाल होलिका का दहन हुआ, वातावरण “नरसिंह भगवान की जय” के उद्घोष से गूंज उठा। आसमान रंग- बिरंगी आतिशबाजी से जगमगा उठा और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक ‘धुरखेल’ की शुरुआत की। यहां सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार होलिका की भस्म से होली खेली जाती है, जिसे शुभ और पवित्र माना जाता है। इस अनूठी परंपरा को देखने और उसमें शामिल होने के लिए न केवल बिहार के विभिन्न जिलों से, बल्कि नेपाल, झारखंड और पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी धरती पर दैत्यराज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी, लेकिन वरदान के बावजूद वह स्वयं भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। इसके पश्चात भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया। यह घटना अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक मानी जाती है, जो आगे चलकर होली पर्व के रूप में स्थापित हुई।
भीड़ को देखते हुए प्रशासन द्वारा कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। कार्यक्रम स्थल से लगभग डेढ़ किलोमीटर पहले ही बैरिकेडिंग कर वाहनों को रोक दिया गया था। महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग- अलग प्रवेश और निकास द्वार बनाए गए थे। पुलिस बल और दंडाधिकारियों की तैनाती से पूरा आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। सिकलीगढ़ धरहरा में आयोजित यह राजकीय होलिका दहन महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव बनकर सामने आया, जिसने एक बार फिर पूर्णिया को देश- विदेश के श्रद्धालुओं के केंद्र में ला खड़ा किया।

