पथिक (गीत)
तेरे मन की प्ररेणा आत्म-स्वाभिमान है,
पथिक अविराम चल, ऊँची ये उड़ान है।।
काल को स्तिमित गति से चलना लाज़मी पड़ा,
नियति को प्रारब्ध से भी कहीं लड़ना पड़ा।
फ़िक्र क्या परिणाम की जब गति अविराम है।
तेरी बाँहों में खुला, नीला आसमान है।।
मूकता के शब्द को वाणी की तू शक्ति दे,
नेह संस्कार को समर्पण की भक्ति दे।
निश्चय व्रत को धार चल, कर्म की ये शान है।
सत्य संस्कार का लक्ष्य कल्याण है।।
कुचक्र है यह चल पड़ा दम्भ-दुश्विचार का,
सुबोध का हनन हुआ पतन संस्कार का।
संकल्पशक्ति सिद्ध कर, आयुद्ध प्रेम बाण है।
स्वयं को दोषमुक्त कर,
संग में तेरे 'राम' हैं।।
पथिक अविराम चल, ऊँची ये उड़ान है।

