अनुवाद के महत्व पर मंथन: हिंदी विश्वविद्यालय में एक दिवसीय कार्यशाला संपन्न
कोलकाता/हावड़ा (26 फरवरी 2026)
हिंदी विश्वविद्यालय में माननीय कुलपति प्रो. डॉ. नंदिनी साहू की अध्यक्षता में एक दिवसीय अनुवाद कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन विश्वविद्यालय परिसर में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में अनुवाद की वर्तमान प्रासंगिकता, उसकी जटिलताओं तथा वैश्विक संदर्भों में उसकी भूमिका पर गंभीर विमर्श किया गया। कुलपति प्रो. साहू ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि अनुवाद केवल भाषा परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि बौद्धिक, सांस्कृतिक और संदर्भगत रूपांतरण का सूक्ष्म कार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक सक्षम अनुवादक के लिए स्रोत एवं लक्ष्य भाषा का गहन ज्ञान, विषयवस्तु की समझ, व्याकरणिक शुद्धता, शब्द-संपदा, सांस्कृतिक बोध और संदर्भ की पहचान अनिवार्य है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि डिजिटल युग में अनुवादक को तकनीकी दक्षता, रूपांतरण क्षमता तथा सोशल मीडिया शब्दावली की समझ भी विकसित करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “अनुवाद न केवल विचारों के आदान-प्रदान को संभव बनाता है, बल्कि भाषाओं और संस्कृतियों की समृद्धि को संरक्षित और विकसित करने का माध्यम भी है, जो विभिन्न भाषाई समुदायों के बीच सेतु का कार्य करता है।”
कार्यक्रम का संचालन हिंदी एवं अनुवाद विभाग की प्राध्यापिका डॉ. मधुमिता ओझा ने कुशलतापूर्वक किया। इस अवसर पर इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं निदेशक हरीश कुमार सेठी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। उन्होंने अनुवाद अध्ययन और प्रशिक्षण के व्यावहारिक पक्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यद्यपि मशीनी अनुवाद का प्रयोग बढ़ रहा है, किंतु भाषा की आत्मा और संवेदनशीलता को पूरी तरह मशीन में सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने शब्दानुवाद और भावानुवाद के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि केवल शब्दों का अर्थ नहीं, बल्कि उनके पीछे निहित भाव और सांस्कृतिक अर्थ-संकेत भी समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने अनुवाद की प्रक्रिया को चरणबद्ध ढंग से समझाते हुए कहा कि अनुवादक को मूल पाठ का गहन अध्ययन, विश्लेषण और आत्मसात करने के बाद ही अनुवाद प्रारंभ करना चाहिए।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में पश्चिम बंगाल महिला विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अपराजिता हाजरा ने भी ऑनलाइन सहभागिता की। उन्होंने प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक अनुवाद की विकसित होती परंपरा पर विस्तार से चर्चा की तथा प्रसिद्ध साहित्यकार एंथोनी बर्गेस की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि “अनुवाद केवल शब्दों का विनिमय नहीं, बल्कि एक संपूर्ण संस्कृति को बोधगम्य बनाने की प्रक्रिया है।” उनके वक्तव्य ने अनुवाद के सांस्कृतिक आयाम को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।
कार्यक्रम में हिंदी, अनुवाद, इतिहास एवं राजनीतिक विज्ञान विभाग के सभी प्राध्यापक एवं प्राध्यापिकाएं उपस्थित रहे, जिनमें डॉ. सुशील कुमार पांडे, डॉ. इंद्रजीत यादव, डॉ. अजीत कुमार दास, डॉ. के.एन. भारती, डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी, डॉ. गुड्डी कुमारी, डॉ. पारोमिता दास, धीमान महतो, मधुवंती गांगुली, विश्वजीत हजाम एवं सुमित यादव प्रमुख रूप से शामिल थे। हिंदी एवं अनुवाद विभाग की प्राध्यापिका डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में कहा कि डिजिटल और वैश्वीकृत परिवेश में अनुवाद ज्ञान, संस्कृति और व्यापार के आदान-प्रदान में एक प्रभावी सेतु के रूप में कार्य कर रहा है, जिससे भाषाई बाधाएं निरंतर कम हो रही हैं।
कार्यशाला में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विद्यार्थियों की सक्रिय उपस्थिति उल्लेखनीय रही। अपर्णा तिवारी, दीक्षित साव, मानसी परीदा, मधुबाला कुमारी, कीर्ति सिंह, सुजल कुमार राउत, प्रियंका तिवारी, अंशु सिंह, विवेकानंद चौधरी, सुचंदा विश्वास, नसरीन परवीन, अंसूर्या राय, सुशील कुमार शाह, सिमरन साव, आफरीन प्रवीन, रंजन कुमारी साव, नंदनी वर्मा, मुकुल कुमार साव, अंकित साव तथा अमरजीत पंडित सहित अनेक विद्यार्थियों ने सहभागिता कर कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कार्यशाला का विधिवत समापन डॉ. अजीत कुमार दास द्वारा किया गया, जिन्होंने सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजनों को निरंतर जारी रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

