आभा मंडल की ऊर्जा के रंगों का विज्ञान
आभा को शरीर, मन और आत्मा का दर्पण माना जाता है। स्वच्छ और चमकदार रंग अच्छे स्वास्थ्य का, धुंधले या मलिन रंग शारीरिक या भावनात्मक असंतुलन का संकेत दे सकते हैं। आध्यात्मिक परंपरा में आभा को एक सूक्ष्म जैव-विद्युत चुंबकीय क्षेत्र माना जाता है जो प्रत्येक जीवित प्राणी, वस्तु और यहाँ तक कि स्थानों से भी उत्सर्जित होता है। आभा के सात स्तरों का संबंध रीढ़ की हड्डी के साथ स्थित सात ऊर्जा केंद्रों- चक्रों से भी बताया जाता है। विभिन्न रंग व्यक्तित्व, भावनात्मक स्थिति और आध्यात्मिक विकास के चरण के बारे में जानकारी देते हैं। अध्यात्मिक दृष्टि से प्रत्येक चक्र एक विशिष्ट रंग और जीवन के एक पहलू से जुड़ा है। जैसे कि लाल रंग- जीवन शक्ति, जमीन से जुड़ाव, स्थिरता का। नारंगी- रचनात्मकता, आनंद, भावनात्मक्ता का। पीला- बुद्धि, मानसिक स्पष्टता, प्रसन्नता का। हरा-दया, संतुलन,करुणा, हृदय से जुड़ाव का। नीला- शांति, विवेक, स्पष्ट संचार, अंतर्ज्ञान का और बैंगनी-उच्च चेतना, आध्यात्मिक्ता, आत्मबोध व ज्ञान का सफेद रंग- पवित्रता, उच्च आध्यात्मिक विकास का तथा काला भूरा रंग- अवरोध,जड़ता का परिचय देता है।
एक ओर विज्ञान इसे एक रंग-दृश्य संवेदना या प्रकाश की भौतिक घटना के रूप में समझने का प्रयास करता है, वहीं आध्यात्मिक परंपराएँ इसे जीवन ऊर्जा, चेतना और स्वास्थ्य का दर्पण मानती हैं। विज्ञान की दृष्टि से आभा का अध्ययन साइनेस्थीसिया के रुप में किया जाता है अर्थात् संवेदनात्मक अनुभवों का मिश्रण जो एक प्रमाणित तंत्रिका-विज्ञान स्थिति है जिसमें एक संवेदी इनपुट, जैसे किसी का चेहरा देखना, स्वचालित रूप से दूसरी संवेदना जैसे रंग का दर्शन पैदा करना शामिल है। कुछ व्यक्ति लोगों के चारों ओर रंगीन प्रभामंडल देखने की क्षमता रखते हैं, जो उनके प्रति उनकी भावनात्मक प्रतिक्रिया से जुड़ा होता है। शोध से पता चला है कि यह अनुभव वास्तविक और वस्तुनिष्ठ रूप से मापने योग्य हो सकता है, जो इसे केवल कल्पना नहीं, बल्कि एक विशिष्ट मस्तिष्क संरचना से जुड़ी घटना बनाता है। इसमें दृष्टि एवं प्रकाश तंत्र कहता है कि हमारी आँख की शंकु कोशिकाएँ रंगों को पहचानती हैं, जबकि अन्य कोशिकाएँ प्रकाश और अंधेरे का बोध कराती हैं। जैसे कम रोशनी में हमारी शंकु कोशिकाएँ पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पातीं। इस कारण हम रंगों को स्पष्ट नहीं देख पाते, भले ही कैमरा उन्हें दर्ज कर ले।
प्रकाश का रंग तापमान (CCT) और रंग प्रतिपादन सूचकांक (CRI) इस बात को प्रभावित करते हैं कि हम किसी वस्तु या व्यक्ति के रंगों को कैसे अनुभव करते हैं। विभिन्न प्रकाश स्रोत जैसे मोमबत्ती, फ्लोरोसेंट बल्ब हमारी त्वचा और परिवेश के रंग में अंतर पैदा कर सकते हैं।1939 में साइमन किर्लियन ने किर्लियन फोटोग्राफी विकसित की जिसमें डिजिटल कैमरे के माध्यम से उच्च-वोल्टेज क्षेत्र में वस्तुओं से निकलने वाली चमक का चित्र लिया जा सकता है। जब कि आधुनिक प्रणाली में डॉ. जॉन रॉजरसन द्वारा विकसित (EFI) ऊर्जा क्षेत्र की कल्पना में मानक डिजिटल कैमरों का उपयोग करके सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्र को दर्शाया जा सकता है। परंतु इन दोनों की अपनी सीमाएँ हैं। ध्यान रखें कि ये तकनीकें चिकित्सीय निदान की विधि नहीं हैं। इन्हें केवल सहायक आकलन के रूप में देखा जा सकता है। आभा मंडल के विषय में जहां एक ओर अध्यात्मिक्ता 'क्यों' और 'क्या अर्थ है' पर प्रकाश डालती है व मानती है कि ये रंग हमारी आंतरिक अवस्था, हमारी चेतना और ब्रह्मांड से हमारे संबंधों को प्रतिबिंबित करते हैं वहीं दूसरी ओर विज्ञान हमें 'कैसे' का जवाब देता है और बताता है कि मस्तिष्क और दृष्टि तंत्र किस प्रकार रंगों का निर्माण या प्रत्यक्षण करते हैं। दोनों ही दृष्टिकोण इस बात पर सहमत हैं कि हमारे चारों ओर एक सूक्ष्म ऊर्जा का संसार विद्यमान है, चाहे उसे हम माप सकें या नहीं।
यदि आप अपने आभा मंडल के अनुभव व संबध को समझना चाहते हैं तो कुछ सरल विधियों का अभ्यास कर सकते हैं जैसे कि शांत वातावरण में बैठें कर किसी व्यक्ति या वस्तु पर कोमलता से दृष्टि टिकाएं। दर्पण के सामने अपना ध्यान अपने आस-पास की सीमा, कंधों के ऊपर और सिर के चारों ओर केंद्रित करें। शरीर के बाहरी किनारों को देखते हुए, अपनी दृष्टि को फोकस करने का प्रयास करें। आपको एक हल्की सी चमक, किसी रंग का एक अहसास या धुंधली रोशनी दिखाई दे सकती है। पहली बार में स्पष्ट रंग न भी दिखें तो कोई बात नहीं। यह धैर्य और अभ्यास से विकसित होने वाली संवेदनशील प्रक्रिया है। वहीं दूसरे का ऑरा देखने के लिए आपके अपने आभा मंडल का पूर्ण शुद्ध होना व सजगता से अभ्यास एक अनिवार्य अंग है।
इस प्रकार इन रंगों का विज्ञान हमारे आंतरिक और बाह्य विश्व के बीच एक गहन संबंध की व्याख्या करता है जो हमारी अध्यात्मिक व भौतिक प्रगति में सहायक सिद्ध होता है।

