तटबंध की मजबूती पर करोड़ों खर्च, फिर भी टूटते रहे बांध, बाढ़ ने मचाई तबाही
दो साल में करीब 130 करोड़ के कटावरोधी और तटबंध सुदृढ़ीकरण कार्य, फिर भी सितंबर में कई जगह टूटे तटबंध और रिंग बांध
✍️ धर्मेंद्र रस्तोगी
छपरा, 05 अक्टूबर 2026
सारण में बाढ़ और तटबंध टूटने की घटनाओं ने नदी तटबंधों की मजबूती पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। बाढ़ से बचाव और कटावरोधी कार्यों के नाम पर पिछले दो वर्षों में करीब 130 करोड़ रुपये के कार्य कराए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद सितंबर में जिले के कई हिस्सों में तटबंध और रिंग बांध टूट गए। इससे बड़ी आबादी को बाढ़ के पानी की मार झेलनी पड़ी और गांवों में तबाही का मंजर देखने को मिला। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि मकेर के हैजलपुर तटबंध को लेकर उठ रहा है। यहां तटबंध की मजबूती पर पहले भी करोड़ों रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद इसी क्षेत्र में तटबंध के क्षतिग्रस्त होने से बाढ़ का पानी तेजी से गांवों की ओर फैल गया।
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष- 2025 में तटबंधों की मरम्मत और सुदृढ़ीकरण के लिए करीब 40.40 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इनमें मकेर के हैजलपुर- बैकुंठपुर- लखनिया, सोनपुर के बलिटोला- सबलपुर, दिघवारा- अकीलपुर, छपरा सदर प्रखंड के कोटवा- रामपुर- कुटुबपुर, मांझी के फुलवरिया और दुवौंडीह सहित कई तटबंध शामिल थे। वर्ष- 2026 में भी तटबंधों और नदी कटाव से बचाव के लिए 89.56 करोड़ रुपये के कार्यों का टेंडर जारी किया गया। इनमें मकेर प्रखंड अंतर्गत हैजलपुर तटबंध के लिए करीब 20.57 करोड़ रुपये, सोनपुर बलिटोला- सबलपुर के लिए करीब 57.55 करोड़ रुपये, छपरा सदर के कोटवा- रामपुर- कुटुबपुर के लिए 7.65 करोड़ और दिघवारा मलखाचक के लिए करीब 3.72 करोड़ रुपये के कार्य शामिल हैं।
इस तरह वर्ष- 2025 और 2026 को मिलाकर करीब 129.95 करोड़ रुपये के कटावरोधी और तटबंध सुदृढ़ीकरण कार्यों पर प्रावधान किया गया। इसके बावजूद सितंबर में मकेर के हैजलपुर और बाघाकोल, तरैया और पानापुर प्रखंड के सरौजा- भगवानपुर सहित कई इलाकों में तटबंध अथवा रिंग बांध क्षतिग्रस्त हुए है। लगातार हो रहे कटाव और तटबंध टूटने की घटनाओं ने सिर्फ निर्माण पर खर्च होने वाली राशि ही नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता, निगरानी और स्थायी समाधान पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। बाढ़ आने के बाद मरम्मत के बजाय यदि तटबंधों की संवेदनशील पट्टियों का स्थायी सुदृढ़ीकरण और नियमित निगरानी सुनिश्चित नहीं हुई तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हर साल बाढ़ के दौरान यही तस्वीर दोहराए जाने का खतरा बना रहेगा।

