सिद्ध संत श्री गौरी दत्त बाबा के पवित्र समाधि-स्थल तथा उनकी स्मृति में निर्मित शिव-हनुमान मंदिर
✍️प्रो डॉ अमरनाथ प्रसाद, अंग्रेजी विभागाध्यक्ष,जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा, बिहार
'सारण के संत' शीर्षक ग्रंथ की रचना के क्रम में मैं और मेरी अन्वेषण-टीम रविवार, 6 सितंबर 2026 को सिद्ध संत श्री गौरी दत्त बाबा के पवित्र समाधि-स्थल तथा उनकी स्मृति में निर्मित शिव-हनुमान मंदिर पर पहुँची। यह पवित्र स्थान छपरा से 25 कि.मी.उत्तर ,रेवा रोड पर भेल्दी से भिठी मार्ग में 6 km पर तरवार पंचायत(चौबे टोला) में स्थित है.
आज के अन्वेषण का उद्देश्य था — बाबा के जीवन, साधना और सिद्धियों से जुड़े तथ्यों को गाँव के वृद्धजनों और ज्ञानी लोगों के मुख से सुनना, समझना और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करना। यह आलेख उसी क्षेत्र-भ्रमण, संवाद और अवलोकन का संकलन है।आज के इस अन्वेषण टीम मेरे साथ थे इंजीनियर राहुल कुमार; मेरे शोधार्थी आदर्श कौशिक और श्री सुरेश कुमार चौबे (सेवानिवृत्त बैंककर्मी, मूल निवासी बैद्यनाथपुर) । मैं श्री सुरेश कुमार चौबे जी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने सिद्ध संत गौरी दत्त बाबा के जीवन और उनसे सम्बंधित लोक जीवन में प्रचलित कई अनछुए प्रसंगों से अवगत कराया।
स्थान-परिचय:
गौरी दत्त बाबा का यह पावन धाम सारण जिले के अमनौर प्रखंड अंतर्गत बैद्यनाथपुर गाँव में अवस्थित है। मंदिर के ठीक बगल में एक विशाल एवं अत्यंत प्राचीन पीपल का वृक्ष है, जिसकी छाया में बाबा वर्षों तक योग-साधना और कठोर तपस्या करते रहे। कहते हैं यह वृक्ष सैकड़ों वर्ष पुराना है और आज भी उसी गरिमा के साथ खड़ा होकर मूक साक्षी की भाँति उस युग की कथा कह रहा है। पीपल की आयु के बारे में इस गांव के वयोवृद्ध लोगों ने बताया कि उनके दादा के बचपन से ही यह ऐसा ही था.
आज भी इस स्थान पर नियमित रूप से पूजा-पाठ, यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं; जिनकी मनौतियाँ पूर्ण होती हैं, वे श्रद्धालु यहाँ आकर विशेष रूप से पूजा-अर्चना करते हैं।
बाबा का जीवन-परिचय :
शिव-संत गौरी दत्त बाबा मूलतः अमनौर के निकट बगही गाँव के निवासी थे। वे दो भाई थे — गौरी दत्त चौबे और योगी दत्त चौबे। एक भाई योगी दत्त चौबे बगही गाँव में ही रह गए, जबकि दूसरे भाई गौरी दत्त चौबे इस निर्जन स्थान पर, जहाँ विशाल पीपल का पेड़ खड़ा था, आकर तपस्या में लीन हो गए। आज उसी स्थान पर बाबा की समाधि है।
नामकरण की कथा :
इस पवित्र वृक्ष का बैद्यनाथ धाम से क्या संबंध है और गाँव का नाम बैद्यनाथपुर क्यों पड़ा — इस रहस्य पर गाँव के मूल निवासी, सेवानिवृत्त बैंककर्मी श्री सुरेश कुमार चौबे ने विस्तार से प्रकाश डाला। उनके अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल की बात है, जब कुछ कांवरिया जल लेकर बैद्यनाथ धाम की ओर जा रहे थे। मार्ग में जब वे इस स्थान पर पहुँचे तो सुनसान परिवेश, पीपल की छाया और रमणीक वातावरण देखकर उन्होंने यहीं विश्राम किया । संत गौरी दत्त बाबा ने आचमन करने के लिए कांवरियों से थोड़ा गंगाजल मांगा । कांवरियों ने कहा कि यह जल बाबा बैद्यनाथ को अर्पित करने के लिए हैं और ऐसा कहकर फिर आगे बैद्यनाथ धाम के लिए प्रस्थान कर गए।
बैद्यनाथ धाम में जल चढ़ाने के एक रात्रि पूर्व, जहाँ वे ठहरे हुए थे, वहाँ कांवरियों को एक स्वप्न आया — कि रास्ते में जिस स्थान पर तुम रात्रि-विश्राम कर रहे थे, वह अत्यंत सिद्ध स्थान है, और वहाँ जो संत निवास करते हैं, वे परम शुद्ध व सिद्ध पुरुष हैं। लौटते समय वहाँ अवश्य जल अर्पित करना, तभी तुम्हारी यह यात्रा और पूजा सफल मानी जाएगी। इस स्वप्नादेश का पालन करते हुए सभी कांवरियों ने बैद्यनाथ धाम में आधा जल अर्पित किया और शेष आधा जल लौटते समय इसी स्थान पर अर्पित किया। बाबा ने उन कावरियों से आचमन हेतु थोड़ा गंगाजल मांगा था जिसे वे बाबा वैद्यनाथ निमित्त होने का हवाला देकर मना कर चुके थे तथा स्वप्न के बाद उसी वैद्यनाथ धाम के जलांश से गौरीदत्त बाबा का अभिषेक हुआ,अतः स्थान वैद्यनाथपुर कहलाया।
देवघर में इस गांव के पंडों की पंजी में यह अद्भुत रिकार्ड आज भी उपलब्ध है जब उस धाम का जल वापस किसी स्थान पर अर्पित हुआ हो। देवघर के पंडों वाली बात सुरेश चौबे जी के ग्रामीण सखा पर नाता में चाचा सेवानिवृत्त संस्कृत शिक्षक श्री नरेश चौबे जी सौजन्य से ज्ञात हुई। वे अक्सर वहां दर्शनार्थ जाते रहे हैं।
कालांतर में इस चमत्कारिक शिव कृपा पर वंशजों द्वारा गौरी महादेव मंदिर का निर्माण समाधिस्थल पर हुआ। प्रारंभ में बाबा की समाधि एक साधारण चबूतरे के रूप में थी। समय बीतने के साथ इसी चबूतरे के स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया, जिसमें भगवान शंकर की मूर्ति प्रतिष्ठित है — क्योंकि बाबा स्वयं शिवस्वरूप माने जाते थे। इसीलिए यहाँ शिव का दर्शन ही मानो गौरी दत्त बाबा का साक्षात दर्शन माना जाता है। मंदिर के ठीक बगल में हनुमान जी का भी एक मंदिर है, और प्राचीन पीपल वृक्ष आज भी उसी गरिमा से खड़ा होकर इस समूची गाथा की गवाही देता है।
गाँव के ही वयोवृद्ध श्री शंभू चौबे , श्री देवेंद्र चौबे, श्री मधुसूदन चौबे ने बताया कि उनके बचपन में भी यह वृक्ष ठीक वैसा ही था, और मंदिर के पास एक चबूतरा हुआ करता था। इसी चबूतरे को परिवर्तित कर शिवजी का मंदिर बनाया गया। गाँव के ही एक अन्य वरिष्ठ नागरिक श्री सतीश कुमार चौबे ने कहा की गौरी दत्त बाबा के गले में नीलकंठ भगवान शिव के गले पर अंकित निशान जैसा ही एक काला चिह्न था, और उन पर भोलेनाथ की असीम कृपा थी।
सिद्धि-प्राप्ति की कथा :
श्री सतीश कुमार चौबे ने एक अत्यंत रोचक प्रसंग भी साझा किया। कथा है कि बाबा बैद्यनाथ धाम में एक गुरु के आश्रम में रहा करते थे। उस समय शिष्य वन से लकड़ियाँ लाकर गुरु-सेवा करते थे, और गुरुजी उन्हीं लकड़ियों से भोजन तैयार करते थे। एक बार वन में लकड़ी लाने गए बाबा का सामना अचानक एक बाघ से हो गया। प्राण बचाने के लिए वे पास के एक बेल वृक्ष पर चढ़ गए और भय के मारे बेल का एक फल तोड़कर नीचे फेंक दिया, जो ठीक बाघ के मुख में जाकर अटक गया। इसी बीच बाबा निरंतर शिव-जाप करते रहे। कहा जाता है कि भगवान शिव स्वयं एक अत्यंत वृद्ध पुरुष के रूप में वहाँ प्रकट हुए और बाघ वहाँ से भाग गया। शिव ने बाबा को दीक्षा दी, जिससे वे उसी क्षण से सिद्ध संत बन गए। इसके पश्चात् वे स्थान-स्थान भ्रमण कर शिव-भक्ति का प्रचार करने लगे और अनेक स्थानों पर बड़े-बड़े पंडितों तथा महात्माओं के साथ शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त की। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान और पहुँचे हुए योगी माने जाते थे।
गाँव की विशिष्टता और आस्था:
बैद्यनाथपुर जैसा छोटा-सा गाँव, जो नगर से बहुत दूर स्थित है, फिर भी इसने अनेक बड़े पदाधिकारी, आई.ए.एस. अधिकारी तथा स्वतंत्रता सेनानी दिए हैं। गाँव के लोगों की गहरी आस्था है कि यह सब गौरी दत्त बाबा की ही कृपा है, जिसके कारण यह गाँव अत्यंत सम्पन्न व प्रतिष्ठित है और हिंदुस्तान के विभिन्न बड़े कार्यालयों में इस गाँव के लोग ऊँचे पदों पर कार्यरत हैं।
मंदिर के निकट ही निवास करने वाले होम्योपैथी के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. उदय शंकर चौबे निर्धनों को निःशुल्क चिकित्सा-सेवा प्रदान करते हैं। उनका कहना है कि रोगी, विशेषकर दीर्घकालिक (क्रॉनिक) व्याधियों से ग्रस्त लोग, दवा ले जाने से पहले बाबा की समाधि का स्पर्श अवश्य करते हैं, और उनका विश्वास है कि बाबा के आशीर्वाद तथा औषधि के संयुक्त प्रभाव से ही उनकी व्याधि दूर होती है। डॉक्टर साहब निर्धनों से कोई शुल्क नहीं लेते; स्वस्थ हो जाने पर श्रद्धालु अपनी इच्छानुसार मंदिर में रखे दान-पात्र में दान अर्पित कर देते हैं।
प्रवेश द्वार और शिलालेख:
गांव के प्रवेशद्वार पर सफेद पत्थर पर उत्कीर्ण तथ्य इस आयोजन के संयोजक एवं ग्रामीण सुरेश चौबे जी के दादा वैद्यजी के नाम से ख्यात,स्वतंत्रता सेनानी एवं वानप्रस्थी स्व. गोरख नाथ चतुर्वेदी द्वारा संपन्न हुआ है.
गेट के एक ओर श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक अंकित हैं तो दूसरी ओर बाबा के जीवन का संक्षिप्त परिचय उत्कीर्ण है। यह उल्लेखनीय है कि इन शिलालेखों में वर्णित विवरण गाँव के वृद्धजनों द्वारा बताई गई कथाओं से पूर्णतः मेल खाते हैं, जो इस मौखिक परंपरा की प्रामाणिकता को और पुष्ट करता है।
पीपल की छाया में साधनारत एक तपस्वी की कथा जब स्वप्न, श्रद्धा और लोक-विश्वास के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सँजोई जाती है, तो वह मात्र किंवदंती नहीं रह जाती — वह उस मिट्टी का इतिहास बन जाती है। गौरी दत्त बाबा की समाधि, शिव-हनुमान मंदिर और वह प्राचीन पीपल वृक्ष आज भी बैद्यनाथपुर के जनजीवन में आस्था, स्वास्थ्य और स्मृति के त्रिवेणी-संगम की भाँति विद्यमान हैं। इस लोक-आख्यान को संकलित करना और उसे साहित्यिक रूप में सुरक्षित रखना ही 'सारण के संत' शृंखला के अंतर्गत इस अन्वेषण-यात्रा का सार्थक प्रतिफल है।

