भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र की राजभवन से बर्खास्तगी: नियुक्ति से निष्कासन तक की पढ़े पूरी दास्तान
विरासत के सम्मान से प्रशासनिक कार्रवाई तक का सफर
सारण (बिहार) संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी: लोक संस्कृति के पुरोधा और 'भोजपुरी के शेक्सपियर' के रूप में विश्वविख्यात भिखारी ठाकुर के परिवार से जुड़ा एक बड़ा प्रशासनिक घटनाक्रम सामने आया है। बिहार के राजभवन सचिवालय द्वारा महान लोक कलाकार के प्रपौत्र सुशील कुमार ठाकुर की सेवा को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया गया है। यह मामला एक तरफ जहां लोक कलाकारों के परिवारों को तात्कालिक सहानुभूति और संबल देने की संस्कृति से जुड़ा है, वहीं दूसरी तरफ यह प्रशासनिक नियमों, योग्यता मानकों और कार्यकुशलता की कसौटी पर भी खरा उतरने की अनिवार्यता को रेखांकित करता है। इस पूरी घटना ने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में खासी चर्चा छेड़ दी है।
पूर्व राज्यपाल की घोषणा और नियुक्ति का पृष्ठभूमि:
यह पूरी कहानी पिछले साल दिसंबर महीने में शुरू हुई थी। बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्मद खान 18 दिसंबर 2025 को सारण जिले के डोरीगंज थाना क्षेत्र अंतर्गत कुतुबपुर दियारा पहुंचे थे। यह गांव भोजपुरी के महान नाटककार और कवि भिखारी ठाकुर की जन्मस्थली है। इस यात्रा के दौरान राज्यपाल ने भिखारी ठाकुर के परिजनों से मुलाकात कर उनकी पारिवारिक व आर्थिक स्थिति का जायजा लिया।
लोक संस्कृति और लोक कला के क्षेत्र में भिखारी ठाकुर के अतुलनीय योगदान को सम्मान देने के साथ- साथ उनके परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करने के उद्देश्य से राज्यपाल ने उनके पढ़े- लिखे बेरोजगार प्रपौत्र सुशील कुमार ठाकुर को राजभवन में नौकरी देने की सार्वजनिक घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद प्रशासनिक प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी और 23 जनवरी 2026 को राजभवन सचिवालय द्वारा आदेश संख्या- 205 जारी किया गया। इस आदेश के तहत स्वर्गीय दिनकर दयाल ठाकुर के पुत्र सुशील कुमार को राजभवन सचिवालय में स्टेनोग्राफर (आशुलिपिक) के पद पर वेतन स्तर- 4 के अंतर्गत परिवीक्षा (प्रोबेशन) पर नियुक्त किया गया था। इस नियुक्ति को परिवार के लिए एक बड़े सम्मान और राहत के रूप में देखा गया था।
वर्तमान प्रशासन द्वारा सेवा समाप्ति का मुख्य आधार:
नियुक्ति के कुछ महीनों के भीतर ही कार्य- व्यवहार और तकनीकी दक्षता को लेकर सवाल खड़े होने लगे। राजभवन के अतिरिक्त मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह द्वारा जारी विस्तृत आदेश पत्र में सेवा समाप्ति के निम्नलिखित प्रमुख कारण बताए गए हैं:
अनिवार्य कौशल व अर्हता का अभाव-
बिहार सचिवालय स्टेनोग्राफर सेवा नियमावली- 2006 और सामान्य प्रशासन विभाग के दिशा- निर्देशों के अनुसार, आशुलिपिक के पद पर कार्य करने के लिए शॉर्टहैंड (श्रुतलेख) और हिंदी/अंग्रेजी टाइपिंग का तकनीकी ज्ञान होना अनिवार्य है। जब सुशील कुमार को अधिकारियों के साथ संबद्ध किया गया, तो यह पाया गया कि उनके पास स्टेनोग्राफी का बुनियादी तकनीकी ज्ञान और अपेक्षित टाइपिंग गति नहीं है।
दक्षता परीक्षा से लगातार दूरी-
कर्मचारियों के कौशल और कार्य की गुणवत्ता की जांच के लिए राजभवन द्वारा एक तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया था। समिति के निर्देशानुसार 22 जुलाई 2026 को एक दक्षता परीक्षा आयोजित की गई थी, जिसमें सुशील कुमार शामिल नहीं हुए। उनका तर्क था कि इस प्रकार की दक्षता परीक्षा नियुक्ति से पहले होनी चाहिए थी, न कि बाद में।
प्राकृतिक न्याय और अंतिम अवसर की अनदेखी- राजभवन ने नियमों के तहत संवेदनशीलता दिखाते हुए 29 जुलाई 2026 को एक और पत्र जारी किया और उन्हें 6 अगस्त 2026 को परीक्षा में बैठने का एक और अंतिम अवसर प्रदान किया। इसके बावजूद वह पुनः परीक्षा में अनुपस्थित रहे और परीक्षा से छूट की मांग पर अड़े रहे। प्रशासन ने इसे स्पष्ट रूप से आदेश की अवहेलना और अनुशासनहीनता माना।
परिवीक्षा नियमों का कठोर प्रावधान-
'बिहार सरकारी सेवक परिवीक्षा अवधि नियम- 2024' तथा माननीय उच्चतम न्यायालय के प्रसिद्ध फैसले 'पुरुषोत्तम लाल ढींगरा बनाम भारत संघ' के कानूनी आलोक में यह स्पष्ट किया गया कि परिवीक्षा अवधि (जो कि एक वर्ष से कम थी) के दौरान यदि कार्य संतोषजनक नहीं पाया जाता है और कर्मचारी विभागीय आदेशों की अवहेलना करता है, तो बिना किसी लंबी विभागीय जांच के सीधी सेवा समाप्ति की जा सकती है। इन्हीं कानूनी और प्रशासनिक प्रावधानों का हवाला देते हुए सक्षम प्राधिकार ने उनकी सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दीं।
आखिरकार कौन थे भिखारी ठाकुर-
भिखारी ठाकुर (1887–1971) भोजपुरी भाषा और संस्कृति के निर्विवाद सिरमौर रहे हैं। उन्हें उनकी लोक नाटकों की शैलियों और जन- कल्याणकारी रचनाओं के कारण 'भोजपुरी का शेक्सपियर' कहा जाता है। उन्होंने अपनी कला के माध्यम से समाज की कुरीतियों पर करारा प्रहार किया। 'बिदेसिया', 'गबरघिचोर', 'बेटी बेचवा' और 'विधवा विलाप' जैसी उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं। उनके प्रपौत्र की यह नियुक्ति लोक कला के प्रति आदर भाव का परिणाम थी, किंतु प्रशासनिक दक्षता और नियमावली की अनिवार्यता ने इस प्रकरण को एक नया मोड़ दे दिया है।
सुशील ठाकुर का बयान:
1. तत्कालीन राज्यपाल ने मेरी परिस्थिति देखकर नौकरी दी, तो वर्तमान में उसे वापस लेने का आधार क्या है?
मेरे परिवार की अत्यंत दयनीय आर्थिक स्थिति को तत्कालीन राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान ने स्वयं मेरे घर आकर देखा था। मेरी माता के अनुरोध तथा मेरी शैक्षणिक योग्यता को देखते हुए उन्होंने मुझे आशुलिपिक की नौकरी प्रदान की।
आज प्रश्न यह है कि जिस आधार पर राज्यपाल ने अपनी संवैधानिक/प्रशासनिक शक्ति का प्रयोग करके मुझे नौकरी दी, उसी नौकरी को बाद में नया प्रशासन किस आधार पर समाप्त कर सकता है? राज्यपाल व्यक्ति बदल सकता है, लेकिन राज्य की ओर से की गई वैध नियुक्ति केवल व्यक्ति बदलने से समाप्त नहीं हो सकती।
2. नियुक्ति से पहले पात्रता बदलना अलग बात है, नियुक्ति के बाद उसी को मेरे विरुद्ध लागू करना अलग बात है
नियुक्ति से पहले सरकार/सक्षम प्राधिकारी किसी पद की आयु, योग्यता, दक्षता या अन्य पात्रता-शर्तों में नियमों के अनुसार परिवर्तन कर सकता है।
लेकिन एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद, यदि कर्मचारी ने नियुक्ति की शर्तों के अनुसार सेवा प्राप्त कर ली है, तो बाद में लाई गई या बदली गई किसी कसौटी को उसके विरुद्ध इस्तेमाल कर सेवा समाप्त करने का स्पष्ट वैधानिक आधार होना चाहिए।
अतः मुख्य प्रश्न यह है:
क्या वर्तमान दक्षता परीक्षा की शर्त मेरी नियुक्ति के समय लागू थी? यदि नहीं, तो उसे बाद में मेरे विरुद्ध लागू करने का अधिकार किस नियम/कानून से प्राप्त हुआ?
3. एक ओर भिखारी ठाकुर के नाम पर विश्वविद्यालय, दूसरी ओर उनके प्रपौत्र की नौकरी समाप्त करने की कार्रवाई
बिहार में एक ओर भिखारी ठाकुर के नाम पर विश्वविद्यालय स्थापित करने तथा उनकी कला एवं विरासत को संरक्षित करने की बात की जा रही है।
दूसरी ओर, उसी भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र को, जो हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर है और अपने परिवार का आर्थिक सहारा है, नौकरी से हटाने की स्थिति पैदा की जा रही है।
यह कैसी विडम्बना है कि जिस व्यक्ति के नाम और विरासत को राज्य संस्थागत सम्मान देना चाहता है, उसी के परिवार को आर्थिक रूप से असहाय छोड़ दिया जाए?
मेरी पारिवारिक पहचान के कारण मुझे कोई विशेषाधिकार नहीं चाहिए, लेकिन इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता कि मेरी नियुक्ति स्वयं इसी पारिवारिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि को देखकर की गई थी।
4. जिस शक्ति का प्रयोग करके मुझे नियुक्त किया गया, उसी नियुक्ति को बाद में किस आधार पर पलटा जा रहा है?
मेरी नियुक्ति करते समय तत्कालीन राज्यपाल ने मेरी शैक्षणिक योग्यता और आर्थिक स्थिति, दोनों को देखा और अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए मुझे नौकरी दी।
अब यदि उसी नियुक्ति को समाप्त किया जा रहा है, तो प्रशासन को स्पष्ट करना होगा:
किस वैधानिक प्रावधान के अंतर्गत बाद का प्राधिकारी पूर्व में की गई नियुक्ति को इस प्रकार निष्प्रभावी कर सकता है?
यदि नियुक्ति वैध थी, तो केवल प्राधिकारी/पदाधिकारी के बदल जाने से उसकी वैधता समाप्त नहीं हो जाती।
5. परीक्षा में बैठने से पहले ही असफलता का परिणाम कैसे तय कर दिया गया?
परीक्षा से पहले जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि यदि हम परीक्षा में असफल होते हैं तो हमारी सेवा जारी नहीं रखी जाएगी और हमें नौकरी से बाहर किया जा सकता है।
यह सबसे गंभीर प्रश्न है:
जब परीक्षा अभी हुई ही नहीं, हमारा मूल्यांकन अभी हुआ ही नहीं और यह पता ही नहीं कि हम सफल होंगे या असफल—तो प्रशासन ने पहले से यह कैसे तय कर लिया कि असफल होने पर हमें नौकरी से निकाल दिया जाएगा?
यदि परीक्षा निष्पक्ष योग्यता-परीक्षण है, तो परिणाम आने से पहले ही उसके परिणामस्वरूप सेवा समाप्ति की घोषणा क्यों?
क्या इससे यह आशंका उत्पन्न नहीं होती कि परीक्षा केवल नौकरी समाप्त करने का माध्यम बन गई है?
6. नियुक्ति के पहले दिन से भेदभाव और अब उसी का परिणाम परीक्षा के रूप में
मेरी शिकायत है कि नियुक्ति के दिन से ही मुझे वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से भेदभाव, उपेक्षा, असमान व्यवहार और नापसंदगी का सामना करना पड़ा।
मैंने इसे सहते हुए अपनी सेवा जारी रखी। लेकिन अब वही परिस्थितियाँ धीरे-धीरे एक ऐसी परीक्षा के रूप में सामने आई हैं जिसे मेरी नौकरी बचाने की अंतिम शर्त बताया जा रहा है।
7. प्रधानमंत्री द्वारा भिखारी ठाकुर का सम्मान और वर्तमान परिस्थिति-
देश के प्रधानमंत्री सहित अनेक सार्वजनिक मंचों पर बिहार की महान लोक-सांस्कृतिक विभूतियों का उल्लेख सम्मान और गर्व के साथ किया जाता है। भिखारी ठाकुर भी बिहार की इसी महान लोकपरंपरा के प्रमुख प्रतीक हैं।

