ज्ञान और राष्ट्र निर्माण के प्रणेता- भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन: शिक्षक से राष्ट्रनायक तक का प्रेरणास्पद सफर
✍️ धर्मेंद्र रस्तोगी
भारतीय इतिहास में कुछ ही ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने ज्ञान, आचरण और विचारों से संपूर्ण राष्ट्र को दिशा दी हो। भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक ऐसा ही दैदीप्यमान नक्षत्र थे। उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि किसी व्यक्ति में उच्च कोटि की शिक्षा, अटूट अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण हो, तो वह विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी सफलता के सर्वोच्च शिखर को छू सकता है। 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक साधारण परिवार में जन्में डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी मेधा और परिश्रम के बल पर भारतीय संस्कृति और दर्शन को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया। उनके जन्मदिन को भारत में 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि एक शिक्षक का पद देश के सर्वोच्च पदों से भी ऊपर और आदरणीय होता है।
साधारण परिवेश से असाधारण बौद्धिक यात्रा
डॉ. राधाकृष्णन का शुरुआती जीवन संघर्षों और अभावों से भरा हुआ था। उनके पिता सर्वपल्ली विरास्वामी एक गरीब लेकिन विद्वान ब्राह्मण थे। परिवार का भरण-पोषण करना ही एक बड़ी चुनौती थी, जिसके कारण राधाकृष्णन को बचपन में सुख-सुविधाएं नसीब नहीं हुईं। लेकिन उनकी रुचि हमेशा से अध्ययन और ज्ञानार्जन में रही। उनकी प्रारंभिक शिक्षा तिरुमनी गांव में ही हुई। इसके बाद, वर्ष 1896 में उनके पिता ने उनका दाखिला क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति में करा दिया, जहाँ उन्होंने पांच वर्षों तक पढ़ाई की। इसके पश्चात उन्होंने वेल्लूर और मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से अपनी आगे की शिक्षा पूरी की। छात्र जीवन से ही वे अत्यंत मेधावी थे और दर्शन शास्त्र के प्रति उनका विशेष लगाव था। उन्होंने दर्शन शास्त्र में ही स्नातकोत्तर (एम.ए.) की उपाधि प्राप्त की और भारतीय दर्शन के विविध पहलुओं का गहन अध्ययन किया।
शिक्षक के रूप में उत्कृष्टता और वैश्विक पटल पर ख्याति:
डॉ. राधाकृष्णन ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण 40 वर्ष एक शिक्षक के रूप में बिताए। उनके लिए शिक्षण केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि एक पवित्र साधना थी। चेन्नई से ऑक्सफोर्ड तक का सफर: वर्ष 1916 में वे चेन्नई के प्रसिद्ध मद्रास रेजिडेंसी कॉलेज में दर्शन शास्त्र के सहायक प्राध्यापक बने। उनकी विद्वत्ता और पढ़ाने की अनूठी शैली ने जल्द ही उन्हें अकादमिक जगत में विशेष पहचान दिलाई। उनकी ख्याति देश की सीमाओं को लांघकर विदेशों तक पहुँची और उन्हें इंग्लैंड के प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय दर्शन शास्त्र के शिक्षक के रूप में आमंत्रित किया गया।
स्वामी विवेकानंद का प्रभाव-
डॉ. राधाकृष्णन स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानते थे। उन्होंने स्वामी जी के विचारों का गहन अध्ययन किया था और अपने ओजस्वी भाषणों व लेखों के माध्यम से पश्चिमी दुनिया को भारतीय दर्शन, उपनिषदों और वेदांत के वास्तविक स्वरूप से अवगत कराया।
विद्वता का सम्मान-
वह जिस मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से पढ़े थे, बाद में उसी संस्थान के उपकुलपति बनाए गए। इसके उपरांत, उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के उपकुलपति का पद संभाला और शिक्षा व्यवस्था को सुधारने में अपना अमूल्य योगदान दिया।
स्वतंत्र भारत के राजनयिक और कुशल प्रशासक:
जब देश को स्वतंत्रता मिली, तब देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. राधाकृष्णन की कूटनीतिक और बौद्धिक क्षमता पर भरोसा जताते हुए उन्हें सोवियत संघ (रूस) में भारत का विशिष्ट राजदूत बनाकर भेजा। उन्होंने 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। संसद में उनके शालीन व्यवहार, तार्किक वचनों और कार्यशैली की सभी लोग मुक्तकंठ से प्रशंसा करते थे। 13 मई 1952 से 13 मई 1962 तक उन्होंने देश के उपराष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। इसके पश्चात, 13 मई 1962 को वे भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।
अभूतपूर्व चुनौतियाँ और दृढ़ नेतृत्व:
देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के शांत कार्यकाल के विपरीत, डॉ. राधाकृष्णन का राष्ट्रपति कार्यकाल अत्यधिक चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील दौर से गुजरा।
इस दौरान देश को चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध जैसी गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। विशेषकर 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान राष्ट्र को मानसिक और रणनीतिक रूप से संभालना एक बड़ी परीक्षा थी। उनके ही कार्यकाल के दौरान देश ने दो प्रधानमंत्रियों (पंडित जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री) को खो दिया। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों और राष्ट्रीय संकटों के बीच डॉ. राधाकृष्णन ने अपने अद्भुत संयम, सरल कार्यशैली और दूरदर्शिता का परिचय दिया। उनके सौम्य स्वभाव के कारण उनके राजनीतिक सहकर्मियों के बीच उनका विरोध न के बराबर और सम्मानसर्वोच्च था।
साहित्यिक सृजन और बहुआयामी कृतित्व:
डॉ. राधाकृष्णन केवल एक राजनेता या शिक्षक नहीं थे, बल्कि वे एक महान दार्शनिक और लेखक भी थे। उन्होंने भारतीय धर्म और दर्शन पर अंग्रेजी भाषा में अनेक अमूल्य ग्रंथों की रचना की। उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं:
गौतम बुद्धा-
जीवन और दर्शन
धर्म और समाज
भारत और विश्व
भारतीय दर्शन (Indian Philosophy)
उनकी यह पुस्तकें आज भी दुनिया भर के शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करती हैं।
अंतरराष्ट्रीय सम्मान और अलौकिक उपलब्धियाँ:
देश और दुनिया में शिक्षा, दर्शन और शांति के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक सर्वोच्च राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया:
भारत रत्न-
शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से अलंकृत किया गया।
ब्रिटिश एकेडमी की सदस्यता-
वर्ष 1962 में उन्हें 'ब्रिटिश एकेडमी' का सदस्य बनाया गया।
पोप जॉन पाल का सम्मान-
पोप जॉन पाल द्वारा उन्हें 'गोल्डन स्पूर' भेंट किया गया।
ऑर्डर ऑफ मेरिट-
ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित 'आर्डर ऑफ़ मेरिट' का सम्मान प्रदान किया गया।
टेम्पलटन पुरस्कार-
वर्ष 1975 में उन्हें मरणोपरांत अमेरिकी सरकार द्वारा 'टेम्पलटन पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। धर्म के क्षेत्र में आध्यात्मिक उत्थान के लिए दिया जाने वाला यह पुरस्कार पाने वाले वे गैर-ईसाई समुदाय के पहले व्यक्ति थे।
अंतिम विदाई और शाश्वत प्रेरणा:
वर्ष 1967 के गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने स्पष्ट कर दिया था कि वे अब स्वास्थ्य कारणों से किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति पद पर बने रहना नहीं चाहते हैं। राष्ट्रपति के रूप में उनका वह भाषण उनका अंतिम सार्वजनिक संबोधन था। 17 अप्रैल 1975 को एक लंबी बीमारी के बाद इस महान दार्शनिक और शिक्षक ने इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया।
शिक्षकों के प्रेरणा स्रोत:
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन इस बात की जीवंत मिसाल है कि एक सच्चा शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता; उसके विचार और आदर्श पीढ़ियों तक समाज को आलोकित करते रहते हैं। हर वर्ष 5 सितंबर को 'शिक्षक दिवस' मनाना केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह उस महान परंपरा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर है जो देश के भविष्य का निर्माण करती है। इस पावन अवसर पर देश के श्रेष्ठ शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है, जो डॉ. राधाकृष्णन के सपनों के भारत को साकार करने में जुटे हैं। महान शिक्षाविद और युगदृष्टा डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को कोटि-कोटि नमन।

