मलखाचक की सरस्वती और शारदा का साहस: पिता की गिरफ्तारी के बाद नाबालिग बहनों ने संभाली आजादी की लड़ाई
12 अगस्त 1942 को सारण में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ महिलाओं और ग्रामीणों ने खोला मोर्चा, दिघवारा थाने पर तिरंगा फहराने निकला था जनसैलाब
सारण (बिहार) संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी: भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अगस्त क्रांति का दौर जनआंदोलन, साहस और बलिदान की अनगिनत कहानियों से भरा पड़ा है। सारण की धरती भी इस ऐतिहासिक संघर्ष की महत्वपूर्ण साक्षी रही है। वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान के बाद जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ, तब सारण के मलखाचक गांव में दो नाबालिग बहनों सरस्वती और शारदा ने जिस साहस का परिचय दिया, वह आज भी स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरक गाथा के रूप में याद किया जाता है।
पिता की गिरफ्तारी के बाद बेटियों ने थामा क्रांति का झंडा
12 अगस्त 1942 को ब्रिटिश शासन ने मलखाचक गांव के स्वतंत्रता सेनानी रामविनोद सिंह को गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजी प्रशासन को उम्मीद थी कि एक प्रमुख आंदोलनकारी की गिरफ्तारी के बाद इलाके में आंदोलन की गति धीमी पड़ जाएगी। लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। पिता की गिरफ्तारी के बाद उनकी दोनों नाबालिग बेटियों सरस्वती और शारदा ने निर्भीकता के साथ आंदोलन की कमान संभाल ली।
दोनों बहनों ने ग्रामीणों और आसपास के क्षेत्रों के आंदोलनकारियों को संगठित किया तथा अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। उनका नेतृत्व इस मायने में भी ऐतिहासिक था कि आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में महिलाओं की बड़ी संख्या मौजूद थी।
दिघवारा थाना पर तिरंगा फहराने निकला जनसैलाब
सरस्वती और शारदा के नेतृत्व में आंदोलनकारियों ने दिघवारा थाना परिसर पर तिरंगा फहराने का निर्णय लिया। दोनों बहनों के नेतृत्व में महिलाओं का जत्था आगे बढ़ा, जबकि उनके पीछे बड़ी संख्या में किसान, युवा और स्थानीय ग्रामीण शामिल हो गए।
देखते ही देखते यह आंदोलन जनसैलाब में बदल गया। आंदोलनकारियों का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक प्रतीक माने जाने वाले थाने पर तिरंगा फहराकर अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती देना था।
निहत्थे आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज, दो दर्जन से अधिक घायल
आंदोलनकारियों की बढ़ती भीड़ और नाबालिग बहनों के निर्भीक नेतृत्व से ब्रिटिश पुलिस प्रशासन चिंतित हो उठा। भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। अचानक हुए पुलिसिया हमले से वहां भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गई।
लाठीचार्ज में दो दर्जन से अधिक आंदोलनकारी घायल हुए। इसके बावजूद सरस्वती और शारदा ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। अंततः पुलिस ने दोनों बहनों सहित आंदोलन के कई प्रमुख सहयोगियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। नाबालिग होने के बावजूद उनका जेल जाना क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आक्रोश को और तेज करने वाला साबित हुआ।
सारण में युवा नेतृत्व ने आंदोलन को दी नई धार
1942 के आंदोलन के दौरान सारण में युवा और ऊर्जावान नेताओं ने भी जनआंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुमार कालिका सिंह, शंकरनाथ विद्यार्थी, कृपा सिंह, जगन्नाथ सिंह और कपिलदेव प्रसाद श्रीवास्तव जैसे नेताओं के नेतृत्व में छपरा शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में आंदोलन का प्रभाव बढ़ता गया।
मांझी, दिघवारा, मैरवा और सिवान सहित विभिन्न क्षेत्रों में भी जनता की सक्रिय भागीदारी ने अंग्रेज प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। तत्कालीन प्रशासनिक दस्तावेजों में भी जिले की बिगड़ती कानून-व्यवस्था और बड़े जनविद्रोह की आशंका को लेकर चिंता व्यक्त किए जाने का उल्लेख मिलता है।
छपरा में बंद रहे बाजार, सरकारी कामकाज हुआ प्रभावित
12 अगस्त 1942 को छपरा शहर में भी आंदोलन का व्यापक असर दिखाई दिया। बाजार बंद रहे और सरकारी कार्यालयों में कामकाज प्रभावित हुआ। आंदोलनकारियों ने कलेक्ट्रेट, सिविल कोर्ट और मुख्य डाकघर जैसी महत्वपूर्ण सरकारी संस्थाओं के सामने प्रदर्शन किया तथा कई स्थानों पर ब्रिटिश शासन के प्रतीकों को चुनौती देते हुए तिरंगा फहराने का प्रयास किया।
इसी दौरान छपरा बार एसोसिएशन की आपात बैठक भी हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता सुखदेव नारायण मेहता ने वकीलों से स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में पेशेवर गतिविधियों से अलग होकर संघर्ष में शामिल होने का आह्वान किया। प्रस्ताव को समर्थन मिलना इस बात का संकेत था कि स्वतंत्रता आंदोलन समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंच चुका था।
सरस्वती-शारदा की कहानी आज भी देती है साहस का संदेश
सारण की अगस्त क्रांति की यह गाथा बताती है कि देश की आजादी की लड़ाई केवल बड़े नेताओं और प्रमुख शहरों तक सीमित नहीं थी। गांवों के किसान, महिलाएं, युवा, विद्यार्थी, अधिवक्ता और यहां तक कि नाबालिग बच्चे भी इस संघर्ष का हिस्सा बने थे।
मलखाचक की सरस्वती और शारदा का साहस इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता की भावना उम्र की मोहताज नहीं होती। पिता की गिरफ्तारी के बाद जिस तरह दोनों बहनों ने आंदोलन की कमान संभाली और अंग्रेजी शासन के सामने चुनौती पेश की, वह सारण के स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है।
अगस्त क्रांति की इन गुमनाम और प्रेरक कहानियों को याद करना केवल इतिहास को दोहराना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को यह बताना भी है कि देश की स्वतंत्रता असंख्य लोगों के त्याग, साहस और संघर्ष से हासिल हुई थी।
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