‘घर पर प्रसव’ की पुरानी सोच बदली: अब अस्पताल पर भरोस, महिलाओं ने चुना सुरक्षित मातृत्व
• कभी जागरूकता की कमी से घर में होते थे प्रसव
• पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफॉर्म के सदस्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
• अब गांव की महिलाएं स्वास्थ्य केंद्र में पहुंचकर करा रहीं डिलीवरी
सारण (बिहार): एक समय था जब मैनपुरा गांव में प्रसव को लेकर परिवारों की पहली पसंद घर ही हुआ करता था। स्वास्थ्य केंद्र तक जाने में झिझक, सरकारी अस्पताल में सुविधा नहीं होने की धारणा और वर्षों से चली आ रही सामाजिक मान्यताओं के कारण कई महिलाएं घर पर ही बच्चे को जन्म देती थीं। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। गांव की महिलाओं में जागरूकता बढ़ी है और संस्थागत प्रसव को लेकर भरोसा मजबूत हुआ है। अब महिलाएं कह रही हैं कि प्रसव घर की चारदीवारी में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संस्थान में ही सुरक्षित है। रिविलगंज प्रखंड के मैनपुरा गांव में आयोजित सामुदायिक बैठक में सामने आए संवाद ने इस बदलाव की कहानी को उजागर किया। बैठक में महिलाओं ने एक स्वर में बताया कि अब गांव की कोई भी महिला प्रसव के लिए घर को प्राथमिकता नहीं देती। जरूरत पड़ने पर वे स्वास्थ्य केंद्र जाती हैं और मां-बच्चे की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखती हैं।
यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके पीछे आशा कार्यकर्ताओं, आशा संगिनी, जीविका समूह, स्वास्थ्य विभाग, पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफॉर्म (PSP) के सदस्यों और समुदाय के बीच लगातार संवाद का असर दिखाई देता है। आयुष्मान आरोग्य मंदिर, बिरम परसा में हुई बैठक में कुल 46 लोगों ने भाग लिया। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की थी। इस दौरान केवल स्वास्थ्य विभाग की जानकारी नहीं दी गई, बल्कि महिलाओं ने अपनी पुरानी धारणाओं, शिकायतों और आशंकाओं को खुलकर सामने रखा।
पहले घर था विकल्प, अब अस्पताल बना भरोसा
बैठक में महिलाओं ने बताया कि कुछ वर्ष पहले गांव में प्रसव घर पर होना सामान्य बात मानी जाती थी। इसके पीछे एक बड़ा कारण स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जानकारी का अभाव था। कई परिवारों को यह पता ही नहीं था कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव के साथ कई सुविधाएं नि:शुल्क उपलब्ध हैं। धीरे-धीरे आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्यकर्मियों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व जांच, टीकाकरण, संस्थागत प्रसव और प्रसव के दौरान संभावित जटिलताओं के बारे में जानकारी मिलने लगी। इससे परिवारों की सोच बदली। अब महिलाओं का कहना है कि अस्पताल में प्रसव होने पर यदि अचानक किसी तरह की जटिलता सामने आती है तो प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और चिकित्सक तत्काल उपचार कर सकते हैं। यही भरोसा उन्हें घर की बजाय अस्पताल तक लेकर जा रहा है।
ग्रामीण महिला की आवाज
पहले जानकारी कम थी, इसलिए घर पर ही प्रसव करा लेते थे। अब हम जानते हैं कि अस्पताल में मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा ज्यादा होती है। गर्भ की जांच से लेकर प्रसव और बच्चे के टीकाकरण तक सुविधा मिलती है। इसलिए अब गांव में कोई भी महिला घर पर प्रसव कराने को सही नहीं मानती। उर्मिला देवी, मैनपुरा गांव
सिर्फ सुविधा नहीं, सोच में आया बदलाव
मैनपुरा की कहानी केवल स्वास्थ्य सुविधा बढ़ने की कहानी नहीं है। यह सामुदायिक सोच में बदलाव की कहानी भी है। पहले गर्भावस्था और प्रसव को घर की निजी व्यवस्था का हिस्सा मानने वाली महिलाएं अब इसे स्वास्थ्य का विषय मानकर चिकित्सकीय निगरानी को जरूरी समझ रही हैं। गर्भवती महिला को कब जांच करानी है, कौन-सा टीका जरूरी है, प्रसव कहां होना चाहिए और खतरे के संकेत मिलने पर क्या करना है इन सवालों को लेकर अब समुदाय में अधिक जानकारी है। यही जागरूकता उस समय महत्वपूर्ण साबित होती है, जब प्रसव के दौरान अचानक रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, बच्चे की स्थिति से जुड़ी जटिलता या अन्य समस्या सामने आती है।
पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफॉर्म के सदस्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण
इस बदलाव में पेशेंट स्टेकहोल्डर प्लेटफॉर्म (PSP) के सदस्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। सामुदायिक बैठक में प्लेटफॉर्म के सदस्यों ने महिलाओं और स्वास्थ्य विभाग के बीच संवाद का माध्यम बनकर काम किया। उन्होंने समुदाय में संस्थागत प्रसव को लेकर मौजूद अनुभवों, समस्याओं और भ्रांतियों को सामने रखा तथा स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी वास्तविक स्थिति पर चर्चा की। खासकर सरकारी अस्पताल में मिलने वाली सुविधाओं, प्रसव के दौरान होने वाली परेशानियों, रेफरल की स्थिति सामने लाकर इन मुद्दों पर स्वास्थ्यकर्मियों से स्पष्ट जवाब मांगा गया। इससे बैठक केवल जागरूकता कार्यक्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि समुदाय की आवाज को स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुंचाने और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए फीडबैक देने का मंच भी बनी। PSP सदस्यों ने महिलाओं को उपलब्ध सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठाने, समय पर प्रसव पूर्व जांच कराने और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य केंद्र जाने के लिए प्रेरित करने में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
स्वास्थ्यकर्मी ने भी बताई व्यवस्था की हकीकत
बैठक में सीएचओ शिवा महतो ने महिलाओं के सवालों का जवाब देते हुए बताया कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जरूरी दवाओं और प्रशिक्षित स्टाफ नर्स तथा चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक गर्भवती महिला को केवल गंभीर अथवा हाई-रिस्क स्थिति में ही उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर किया जाता है। सीएचओ ने महिलाओं को सलाह दी कि यदि रेफरल की स्थिति आए तो सरकारी व्यवस्था के तहत सदर अस्पताल में इलाज कराने को प्राथमिकता दें, ताकि अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचा जा सके।
‘रेफर’ शब्द से डरना नहीं, समझना जरूरी
समुदाय में रेफरल को लेकर बनी धारणा भी इस बैठक में महत्वपूर्ण मुद्दा रही। कई परिवारों में यह सोच है कि किसी मरीज को अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर करना सुविधा की कमी का संकेत है। स्वास्थ्यकर्मी ने समझाया कि हाई-रिस्क गर्भावस्था के मामलों में जटिल प्रसव को संभालने के लिए उच्च स्तर के स्वास्थ्य संस्थान की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे मामलों में समय पर रेफरल लापरवाही नहीं, बल्कि सुरक्षित मातृत्व की प्रक्रिया का हिस्सा है। यानी अब संदेश यह देने की जरूरत है कि रेफरल का मतलब इलाज से इनकार नहीं, बल्कि मरीज को उस केंद्र तक पहुंचाना है जहां उसकी जरूरत के मुताबिक बेहतर सुविधा उपलब्ध है।
मां की जांच से बच्चे के टीकाकरण तक जुड़ी पूरी कड़ी
बैठक में प्रसव के अलावा प्रसव पूर्व जांच, टीकाकरण और स्तनपान पर भी चर्चा हुई। इससे यह समझ विकसित करने की कोशिश की गई कि सुरक्षित प्रसव केवल बच्चे के जन्म तक सीमित नहीं है। गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, समय पर टीकाकरण, संस्थागत प्रसव, नवजात की शुरुआती देखभाल और समय पर टीकाकरण—ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। स्वास्थ्यकर्मियों ने बताया कि रिविलगंज सीएचसी में प्रसव पूर्व जांच से लेकर प्रसव तक की सुविधा उपलब्ध है। वहीं आवश्यकता पड़ने पर सदर अस्पताल में सिजेरियन प्रसव और गंभीर नवजातों के लिए एसएनसीयू जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।
‘घर पर प्रसव’ से ‘सुरक्षित प्रसव’ तक का सफर
मैनपुरा में बदलती सोच को एक वाक्य में समझें तो यह ‘घर पर प्रसव’ से ‘सुरक्षित प्रसव’ तक का सफर है। यह बदलाव केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ने से नहीं आया। इसके पीछे कई छोटे-छोटे प्रयास जुड़े हैं। गर्भवती महिला की पहचान, प्रसव पूर्व जांच की सलाह, आशा द्वारा परिवार से संपर्क, सामुदायिक बैठक, अस्पताल की सुविधाओं की जानकारी, टीकाकरण के लिए प्रेरित करना और जटिल स्थिति में समय पर रेफरल। जब इन सभी प्रयासों ने मिलकर काम किया तो पुरानी धारणा धीरे-धीरे कमजोर हुई और संस्थागत प्रसव एक नए सामान्य व्यवहार के रूप में सामने आने लगा।
रिवीलगंज के सीएचओ शिवा महतो बताते है कि आज यहां महिलाएं संस्थागत प्रसव को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरूक हैं। वे जानती हैं कि मां और बच्चे की सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की निगरानी जरूरी है। वे जांच और टीकाकरण के महत्व को समझ रही हैं और जरूरत पड़ने पर अस्पताल जाने में पहले जैसी झिझक नहीं दिखा रहीं। यह बदलाव अभी छोटा लग सकता है, लेकिन जब गांव की एक महिला का अनुभव दूसरी महिला को अस्पताल तक ले जाता है, तो वही बदलाव धीरे-धीरे पूरे समुदाय के व्यवहार को बदल देता है।

