सदियों पुरानी आस्था और रहस्य का केंद्र है छपरा का ऐतिहासिक ‘बाबा धर्मनाथ धनी मंदिर'
एक हजार वर्ष पुराना इतिहास, स्वयंभू शिवलिंग और जीवित समाधि की परंपरा से जुड़ी हैं कई लोककथाएं
सारण (बिहार) संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी: बिहार के छपरा शहर के रतनपुरा इलाके में स्थित बाबा धर्मनाथ धनी मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस प्राचीन मंदिर का इतिहास करीब एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। मंदिर से जुड़ी लोककथाएं स्वयंभू शिवलिंग, संत बाबा धर्मनाथ की साधना, जीवित समाधि और सरयू नदी की पुरानी धारा से जुड़ी कई रोचक बातें बताती हैं।
घने जंगल के बीच प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग, लोकमान्यता में 1016 ईस्वी का उल्लेख
स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब 1016 ईस्वी के आसपास वर्तमान रतनपुरा क्षेत्र घने जंगलों और निर्जन वातावरण से घिरा हुआ था। इसी दौरान यहां भगवान शिव के स्वयंभू शिवलिंग के प्रकट होने की मान्यता है। कहा जाता है कि उस समय इस क्षेत्र में संत बाबा धर्मनाथ कठोर तपस्या किया करते थे। लोककथाओं के मुताबिक, बाबा धर्मनाथ ने ही सबसे पहले इस शिवलिंग के दर्शन किए और यहां भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना शुरू की।
समय के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बनता गया और संत बाबा धर्मनाथ के नाम से इसका नाम ‘बाबा धर्मनाथ धनी मंदिर’ पड़ा।
मंदिर परिसर में बाबा धर्मनाथ की समाधि बनी श्रद्धा का केंद्र
मंदिर से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण मान्यताओं में संत बाबा धर्मनाथ की समाधि का उल्लेख मिलता है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, भगवान शिव की साधना करने के बाद बाबा धर्मनाथ ने इसी पवित्र शिवलिंग के समीप जीवित समाधि ली थी। आज भी मंदिर परिसर में उनकी समाधि श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बनी हुई है।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, परिसर में बाबा धर्मनाथ के अलावा करीब 13 अन्य संत-महात्माओं की समाधियां भी मौजूद हैं। ये समाधियां इस स्थल की पुरानी आध्यात्मिक परंपरा की झलक प्रस्तुत करती हैं।
14वीं पीढ़ी तक पहुंची पूजा की परंपरा
मंदिर की सबसे खास बातों में यहां चली आ रही पूजा-पद्धति भी शामिल है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, शैव परंपरा से जुड़े पुजारी परिवार की 14वीं पीढ़ी वर्तमान समय में मंदिर की पूजा-अर्चना और देखरेख की जिम्मेदारी संभाल रही है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा मंदिर की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को और विशेष बनाती है।
सावन में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
बाबा धर्मनाथ धनी मंदिर के प्रति छपरा और आसपास के क्षेत्रों के लोगों में गहरी आस्था है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन से बाबा भोलेनाथ की पूजा और जलाभिषेक करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
विशेष रूप से सावन के महीने में मंदिर परिसर भक्तिमय हो जाता है। सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, अनुष्ठान और भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है। इस दौरान मंदिर परिसर में ‘हर-हर महादेव’ और ‘बोल बम’ के जयघोष गूंजते हैं।
सरयू नदी से भी जुड़ा है मंदिर का पुराना इतिहास
मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं में इसके भौगोलिक इतिहास का भी उल्लेख मिलता है। लोगों का कहना है कि पुराने समय में सरयू नदी की मुख्य धारा मंदिर के नीचे या इसके बेहद करीब से होकर गुजरती थी। बाद में प्राकृतिक बदलावों के कारण नदी की धारा धीरे-धीरे इस क्षेत्र से दूर चली गई।
हालांकि, नदी की धारा बदल गई, लेकिन बाबा धर्मनाथ धनी मंदिर आज भी अपनी जगह पर श्रद्धा और विश्वास का केंद्र बना हुआ है।
आस्था, इतिहास और लोकविश्वास का अनूठा संगम
बाबा धर्मनाथ धनी मंदिर की पहचान केवल इसकी प्राचीनता से नहीं, बल्कि इससे जुड़ी लोककथाओं, संत परंपरा, स्वयंभू शिवलिंग और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था से भी है। आधुनिक दौर में भी यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु मंदिर के इतिहास और इससे जुड़ी मान्यताओं को बेहद श्रद्धा के साथ सुनते और महसूस करते हैं।
स्थानीय मान्यताओं और लोककथाओं के आधार पर यह मंदिर छपरा की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
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