अगस्त क्रांति के विस्मृत नायक: 1942 में शहादत देने वाले दाउदपुर के 'गिरी बंधुओं' की अमर गाथा और उपेक्षा की मार झेलता परिवार
मुंबई के 'क्रांति मैदान' से शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन का सारण में असर, महज 15 वर्ष की उम्र में जेल जाने वाले अमर शहीद छठू गिरी, कामता गिरी और फागु गिरी के बलिदान की दास्तान:
✍️ संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी
छपरा, 15 अगस्त 2026
सन 1942 को मुंबई के 'क्रांति मैदान' से जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ का नारा दिया, तो उसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दी। वरिष्ठ नेताओं में पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना आजाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण और अशोक मेहता के समर्थन से भारत छोड़ो आंदोलन व्यापक रूप से फैल गया। इस आंदोलन की लपटें बिहार के सारण जिले के मांझी प्रखंड तक भी पहुंची थी। यह वही पावन धरती है जहां वर्ष 1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू मांझी के बरेजा गांव आए थे। नेहरू जी के भाषण से प्रेरित होकर महज 14- 15 वर्ष के एक किशोर छटू गिरी के दिल में राष्ट्रभक्ति का ऐसा जुनून जगा कि वह चरखा समिति के अध्यक्ष बने और अंग्रेजों की यातनाएं सहते हुए 6 महीने जेल में बिताए।
चाचा छठू गिरी को सिवान तो भतीजे को गांव में अंग्रेजों ने गोलियों से भून दिया:
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में छठू गिरी, उनके भतीजे कामता गिरी और फागु गिरी ने अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया। इन्होंने दाउदपुर रेलवे स्टेशन और पोस्ट ऑफिस को ध्वस्त किया तथा सिवान के सीओ कार्यालय और डाकघर पर हजारों छात्रों व युवाओं का नेतृत्व करते हुए तिरंगा फहराया। उग्र आंदोलन से बौखलाए अंग्रेज सिपाहियों ने सिवान में छात्र नेता छठू गिरी और गांव में कामता गिरी व फागु गिरी को गोलियों से भून दिया। स्वतंत्रता के सपने को आंखों में संजोए यह वीर देश के लिए शहीद हो गए।
70 वर्षों बाद भी सरकारी उदासीनता-
स्मारक के नाम पर सिर्फ एक स्तंभ, जर्जर सड़कें और गुमनामी का दंश:
अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाले इन शहीदों के बलिदान को भले ही स्थानीय लोग याद रखते हों, लेकिन सरकारी तंत्र की बेरुखी साफ झलकती है। शहीद के गांव में सड़कों की हालत काफ़ी दयनीय है। राज्य सरकार या जनप्रतिनिधियों द्वारा आज तक इन शहीदों के सम्मान में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। स्मारक के नाम पर गांव में केवल एक स्तंभ खड़ा है, जहां साल में एक- दो बार स्थानीय लोग जुटकर फूल- मालाएं चढ़ा देते हैं।
शहादत का मोल-
दाउदपुर के शहीद परिवार आर्थिक तंगी और बदहाली में जीने को मजबूर:
अंग्रेजों की गोलियों का सामना करने वाले इन गिरी बंधुओं (चाचा भतीजा) का परिवार आज भयानक आर्थिक बदहाली में जीवन बिता रहा है।
अमर शहीद छठू गिरी का परिवार- (चाचा)
बलभद्र गिरी के दो पुत्र छटू गिरी और हीरा गिरी थे। छठू गिरी की शहादत के बाद उनकी पत्नी यमुना देवी ने अपने देवर हीरा गिरी के पुत्र सीताराम गिरी को गोद लिया। सीताराम गिरी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी बसंती देवी आज गांव के ही नवसृजित प्राथमिक विद्यालय में रसोइया (मिड-डे मील वर्कर) का काम कर किसी तरह अपना पेट पाल रही हैं।
अमर शहीद कामता गिरी का परिवार- (भतीजा)
जीव नंदन गिरी के चार बेटों में से दूसरे बेटे कामता गिरी शहीद हुए थे। उनके छोटे भाई नवल किशोर गिरी आज भी उस भयावह दौर को याद कर कांप उठते हैं।
अमर शहीद फागु गिरी का परिवार- (भतीजा)
परीक्षण गिरी के सात पुत्रों में से छठे पुत्र फागु गिरी ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। देशभक्ति के लिए अपनी जान गंवाने वाले वीरों का परिवार आज रोटी- कपड़ा और मूलभूत बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।
35 वर्षों से उपेक्षा का शिकार दाउदपुर के वीर परिवार:
शहीद स्मारक समिति के सचिव सुमन गिरी ने राज्य सरकार की नीतियों और जनप्रतिनिधियों के रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए बताया कि "शहीद स्मारक समिति पिछले 35 वर्षों से गुमनामी के अंधेरे में ढके इन महानायकों की याद में इस दिन को 'सद्भावना दिवस' के रूप में मनाते आ रही है। समय- समय पर कई बड़े नेता, मंत्री और सामाजिक हस्तियां इस पवित्र स्थल पर आईं, बड़े- बड़े वादे किए और आश्वासन दिए। लेकिन आज तक सरकारी स्तर पर शहादत दिवस मनाने की हमारी मांग को अनसुना रखा गया। समिति ने इसके लिए कई बार धरना- प्रदर्शन और भूख हड़ताल भी की, मगर सरकार का रवैया हमेशा उदासीन रहा। यह शहीदों की शहादत का सीधा अपमान है।" वहीं समिति के संरक्षक प्रो. ओमप्रकाश सिंह और कामरेड अरुण कुमार ने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए बताया कि यदि सरकार ने अविलंब दाउदपुर के अमर शहीदों को उचित सम्मान, शहादत दिवस का सरकारी दर्जा और उनके परिवारों को आर्थिक सहायता नहीं दी, तो शहीद स्मारक समिति जल्द ही एक बड़े जनांदोलन की घोषणा करेगी।

