एमयूसी महिला महाविद्यालय में 'वंदे मातरम के 150 वर्ष' पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल समापन, साहित्य और राष्ट्रीय चेतना पर वैश्विक संवाद को मिला नया आयाम
बर्दवान, 8 जुलाई 2026
महाराजाधिराज उदय चंद (एमयूसी) महिला महाविद्यालय, बर्दवान में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी "औपनिवेशिक भारत में साहित्य और राष्ट्रीय चेतना की कथाएँ : वंदे मातरम के 150 वर्ष" का बुधवार को सफल समापन हुआ। महाविद्यालय के इतिहास विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) द्वारा हिंदी विश्वविद्यालय, हावड़ा के सहयोग तथा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) के पूर्वी क्षेत्रीय केंद्र के समर्थन से आयोजित इस संगोष्ठी ने साहित्य, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना पर वैश्विक अकादमिक विमर्श को नई दिशा प्रदान की।
समापन दिवस की शुरुआत महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. अशरफी खातून, आईक्यूएसी समन्वयक डॉ. इंद्राणी पॉल एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इसके बाद पश्चिम बंगाल हिंदी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. नंदिनी साहू ने मुख्य व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए 'वंदे मातरम' के साहित्यिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक भारत में साहित्य ने राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने और स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संगोष्ठी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक भागीदारी देखने को मिली। मॉरीशस के प्रो. अरविंद बिस्सेसुर ने देशभक्ति गीतों और उनके सामाजिक प्रभाव पर व्याख्यान दिया, जबकि डॉ. प्रथा कुंडू (एचएमएम महिला महाविद्यालय, हावड़ा) तथा नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय के डॉ. अभि सुबेदी ने साहित्य, इतिहास, राष्ट्रवाद और दक्षिण एशियाई सांस्कृतिक परंपराओं पर अपने विचार साझा किए।
अकादमिक सत्रों में डॉ. शांतनु चक्रवर्ती (कलकत्ता विश्वविद्यालय), प्रो. भक्तिपदा डोलुई (क्रिस्टिन कॉलेज) तथा डॉ. देबाशीष मंडल के व्याख्यानों के साथ विभिन्न तकनीकी सत्रों में शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। आयोजकों के अनुसार, दो दिवसीय संगोष्ठी के दौरान भारत एवं विदेश के शोधार्थियों द्वारा 80 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
संगोष्ठी के संयोजक एवं महाविद्यालय के इतिहास विभाग के संकाय सदस्य डॉ. इंद्रजीत यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर साहित्य, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्थक अकादमिक संवाद स्थापित करना था। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी ने अंतःविषयक शोध के नए आयाम खोले हैं तथा विभिन्न देशों के विद्वानों के बीच शैक्षणिक सहयोग को और मजबूत किया है।
समापन सत्र में डॉ. यादव ने बर्दवान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शंकर कुमार नाथ, पश्चिम बंगाल हिंदी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. नंदिनी साहू, महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. अशरफी खातून, आईक्यूएसी समन्वयक डॉ. इंद्राणी पॉल, इतिहास विभाग के सभी शिक्षकों, अन्य विभागों के सहयोगियों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों, स्वयंसेवकों तथा देश-विदेश से जुड़े सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि यह संगोष्ठी साहित्य, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना पर भविष्य के शोध को नई गति देगी तथा भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग को और सशक्त बनाएगी।
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