बर्दवान में साहित्य और राष्ट्रीय चेतना पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
'वन्दे मातरम्' के 150 वर्ष पूरे होने पर देश-विदेश के विद्वानों का मंथन, 80 से अधिक शोध पत्र होंगे प्रस्तुत
बर्दवान, 7 जुलाई 2026
महाराजाधिराज उदय चंद महिला महाविद्यालय, बर्दवान के इतिहास विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) द्वारा हिंदी विश्वविद्यालय, हावड़ा के सहयोग से 'राष्ट्र की कथा : औपनिवेशिक भारत में साहित्य और राष्ट्रीय चेतना : वन्दे मातरम् के 150 वर्ष का उत्सव' विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का मंगलवार को भव्य शुभारंभ हुआ। इस संगोष्ठी का आयोजन महाविद्यालय के एपीजे अब्दुल कलाम सभागार में किया जा रहा है।
यह संगोष्ठी भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), पूर्वी क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता तथा शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित की जा रही है। इसका उद्देश्य औपनिवेशिक भारत में राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में साहित्य की भूमिका का गहन अध्ययन करना तथा 'वन्दे मातरम्' की 150वीं वर्षगांठ को अकादमिक रूप से स्मरण करना है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता बर्दवान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) शंकर कुमार नाथ ने मुख्य अतिथि के रूप में की। कार्यक्रम में महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. असरफी खातून, प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. प्रोजित कुमार पालित, प्रो. अपराजिता धर, डॉ. गिरजनंद सिंह बिसेसुर (मॉरीशस), डॉ. निशा ठाकुर, डॉ. हेमंत साहा सहित भारत और विदेशों के अनेक शिक्षाविद, शोधकर्ता एवं विद्वान उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत 'वन्दे मातरम्' के सामूहिक गायन, दीप प्रज्ज्वलन, अतिथियों के स्वागत तथा संगोष्ठी की सार-संग्रह पुस्तिका के विमोचन के साथ हुई। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्य की भूमिका, राष्ट्रीय चेतना के विकास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर विस्तार से अपने विचार रखे।
संगोष्ठी के दौरान विभिन्न शैक्षणिक सत्रों में साहित्य, राष्ट्रवाद, मुद्रण संस्कृति, औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन, सांस्कृतिक पहचान और अंतःविषयक अध्ययन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर मुख्य व्याख्यान, पूर्ण सत्र और शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। इसमें भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों के साथ-साथ नेपाल और मॉरीशस के शोधार्थी एवं शिक्षाविद भी ऑफलाइन और ऑनलाइन माध्यम से भाग ले रहे हैं।
आयोजकों के अनुसार संगोष्ठी में 80 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। उनका विश्वास है कि यह अंतरराष्ट्रीय आयोजन साहित्य, इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना पर गंभीर अकादमिक विमर्श को नई दिशा देगा तथा शोध और ज्ञान-विनिमय को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
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