डिजिटल युग में हिंदी लघुकथा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, साहित्यकारों ने रखे बहुआयामी विचार
नई दिल्ली: शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा ‘डिजिटल युग में हिंदी लघुकथा : संवेदना से स्क्रीन तक की यात्रा’ विषय पर राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर के साहित्यकारों, शोधार्थियों, शिक्षकों एवं साहित्यप्रेमियों ने भाग लेकर समकालीन हिंदी लघुकथा की दिशा, चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर विमर्श किया। कार्यक्रम में डिजिटल माध्यमों, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बदलते साहित्यिक परिवेश पर व्यापक चर्चा हुई।
कार्यक्रम की शुरुआत संचालिका गायत्री उपाध्याय ने की। उन्होंने कहा कि शब्दभूमि प्रकाशन केवल पुस्तकों के प्रकाशन तक सीमित नहीं है, बल्कि साहित्यिक संवाद, सांस्कृतिक विमर्श और सामाजिक चेतना के विस्तार का भी माध्यम है। उन्होंने कहा कि डिजिटल मंचों ने हिंदी साहित्य, विशेषकर लघुकथा को नए पाठक और व्यापक पहचान प्रदान की है।
संगोष्ठी में शोधार्थी संजय शाह ने हिंदी और बांग्ला कहानियों में स्त्री चेतना पर अपने विचार रखते हुए महादेवी वर्मा, कृष्णा सोबती, मनु भंडारी, आशापूर्णा देवी और महाश्वेता देवी की रचनाओं के माध्यम से स्त्री प्रतिरोध और स्वतंत्र चेतना के स्वर को रेखांकित किया।
मुकेश राम ने ‘सोशल मीडिया और लघुकथा : अवसर या चुनौती’ विषय पर बोलते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने नए लेखकों को मंच दिया है और हिंदी साहित्य को वैश्विक पाठक वर्ग तक पहुंचाया है। हालांकि उन्होंने साहित्यिक चोरी, सतही लेखन और लाइक-फॉलोअर्स की संस्कृति को गंभीर चुनौती बताते हुए साहित्यिक मूल्यों की रक्षा पर बल दिया।
डॉ. आशीष कुमारी कांता ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता और लघुकथा की रचनात्मकता पर विचार रखते हुए कहा कि एआई कथाकार को कथानक, चरित्र और प्लॉट निर्माण में सहायता कर सकता है, लेकिन भावनात्मक गहराई और मानवीय संवेदना अब भी मनुष्य की रचनात्मक चेतना से ही संभव है।
राजीव रंजन ने सोशल मीडिया के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्षों पर चर्चा करते हुए कहा कि डिजिटल माध्यमों ने शिक्षा, व्यापार और सामाजिक जागरूकता को नई गति दी है, लेकिन फेक न्यूज, साइबर बुलिंग और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। उन्होंने संतुलित और जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता बताई।
राजस्थान से जुड़े मुन्नाराम मेघवाल ने सोशल मीडिया को चुनौती से अधिक अवसर बताते हुए कहा कि साहित्य सामाजिक और तकनीकी बदलावों से अछूता नहीं रह सकता। वहीं केरल से मिथिला पी. नायर ने कहा कि ब्लॉग, ई-पत्रिकाएं, पॉडकास्ट और वीडियो मंचों ने लघुकथा को वैश्विक पहचान दिलाई है, लेकिन साहित्यिक गुणवत्ता और मौलिकता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
तमिलनाडु से डॉ. वी. मल्लिका ने हिंदी लघुकथा में एआई के प्रयोग और महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता लेखन प्रक्रिया को गति देती है तथा अनुवाद और संपादन में मददगार साबित हो रही है, लेकिन कहानी की आत्मा और मानवीय अनुभव का स्थान कोई तकनीक नहीं ले सकती।
महाराष्ट्र से राहुल भिवा हातागले ने हिंदी लघुकथा की संभावनाओं और उसके बदलते स्वरूप पर चर्चा की। वहीं छत्तीसगढ़ से शांति सोनी ने स्त्री, दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक विमर्श में लघुकथा की भूमिका को रेखांकित करते हुए इसे सामाजिक न्याय और हाशिए के समुदायों की आवाज का प्रभावशाली माध्यम बताया।
राजेश देहाती ने डिजिटल दौर में साहित्य और लोक संवेदना के संबंध पर विचार रखते हुए कहा कि सोशल मीडिया ने गांव, कस्बों और आम जनजीवन से जुड़े अनुभवों को साहित्य के केंद्र में लाने का कार्य किया है।
संगोष्ठी के दौरान कई वक्ताओं ने तकनीकी समस्याओं एवं विषय की पूर्व सूचना नहीं मिलने की बात भी रखी। इस पर पुष्कर, राजस्थान से डॉ. तुहिना प्रकाश शर्मा ने सुझाव दिया कि भविष्य में वक्ताओं को विषय पहले उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे बेहतर तैयारी कर सकें। आयोजकों ने सुझाव का स्वागत करते हुए बेहतर समन्वय का आश्वासन दिया।
कार्यक्रम में डॉ. मिनाक्षी सोनवणे, मुकेश राम, संजय शाह, डॉ. आशीष कुमारी कांता, डॉ. वी. मल्लिका, आशीष अम्बर, डॉ. तुहिना प्रकाश शर्मा, शांति सोनी, राजीव रंजन, मुन्नाराम मेघवाल, मिथिला पी. नायर, राहुल भिवा हातागले एवं सुषमा शुक्ला सहित देशभर के अनेक साहित्यकारों और शोधार्थियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों की सहभागिता ने संगोष्ठी को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करते हुए हिंदी लघुकथा और डिजिटल साहित्य पर बहुआयामी संवाद का मंच बनाया।
कार्यक्रम के आयोजन एवं संचालन में प्रिया श्रीवास्तव, प्रिया पाण्डेय ‘रोशनी’, श्रद्धा गुप्ता ‘केशरी’, नूपुर श्रीवास्तव, निधि कुमारी सिंह एवं गायत्री उपाध्याय की सक्रिय भूमिका रही। अंत में धन्यवाद ज्ञापन निधि गुप्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया।

