मेट्रो में एक घंटे की प्रेम कहानी
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कभी कभी ऐसा होता है की कुछ नयी चीज़ों को लेकर उत्सुकता सी होती है। वैसे ही मुझे थी मेट्रो ट्रेन को लेकर जब से बड़े बड़े शहरों में मेट्रो ट्रेन चली। तब से ही एक सपना था काश कभी ऐसे शहर में मैं भी जाऊं जहां मेट्रो ट्रेन चलती हो। जो मेट्रो ट्रेन में सफर कर चुके होते हैं उनसे कितना सुन रखा था ! बहुत फास्ट चलती है हर दस मिनट में ट्रेन आती है बस एक मिनट रूकती है इतनी भीड़ होती है पूछो मत! सुबह-सुबह खड़े रहने की जगह नहीं होती वगैरह वगैरह।
आज वह दिन आ ही गया मैं और मेरी सहेली आनंद विहार स्टेशन पर उतरी। वहां से हमें मधु विहार द्वारका 3 जाना था!
मेट्रो का पहला सफर था,सुनी सुनाई बातों से भीतर से थोड़ी डरी सहमी सी थी। कहीं ट्रेन छूट न जाए कहीं कोई धक्का मुक्की से गिरा न दे । कई आशंकाओं से घेरे मै कदमों संग चल रही थी।
जब बैठी तो सच में ट्रेन के भीतर अजीब नजारा था। सब कानों में ईयर फोन लगाए अपने में गुम थे। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं, ट्रेन खुली डिब्बे मे सौ से भी अधिक लोग बैठे थे फिर भी पिन ड्राप साइलेंट।
सब एक-दूसरे से अनजान अजनबी से लोग,ऐसा लग रहा था जैसे सभी गुंगे,बहरे हो या इंसानों के मुंह पर ताला बंद कर ट्रेन में बैठा दिया गया हो और वो ताला मोबाइल फोन का था जिसमे सोशल मीडिया का कमाल,सब के सब कान में ईयर फोन लगाए अकेले ही हंस रहे थे,अकेले मुस्कुरा रहे,अकेले ही दुःखी हो रहे थे फिर भी कुछ लोग ऊघं रहे थे। शाम का समय था सभी चेहरो पर इतनी थकान थी मानो सब कुछ हार कर आये हो, शरीर और मन मस्तिष्क सब थककर निठाल बैठा हो! प्रतिक्षा में बस जितना जल्दी हो सके आश्रय तक पहुंचा दिया जाय जहाॅं विश्राम कर पुनः रिचार्ज हो सके।
मैं सब लोगों को ध्यान से देख रही थी। मेरे बगल वाली सीट पर एक लड़की बैठी थी। बड़ी बेचैन सी लग रही थी, मन कर रहा था पूछूँ क्या परेशानी है ?
मगर अनजान बड़ा शहर और अनजान लड़की , कैसे बोले पता नही क्या प्रतिक्रिया दे, कहीं बुरा मान जाए मै मन मार कर बैठ गई।
जब जब भी स्टेशन पर ट्रेन रूकती उसकी निगाहें आतुर हो उठती और दरवाजे की ओर देखने लगती। भीड़ भीतर आती लड़की की निगाहें इनमें से किसी चेहरे को तलाश करती और जब दरवाजा बंद होता मायूस हो आंखें मुंद कर लेती। इस बार ट्रेन रूकी दरवाजा खुला बहुत लोग अन्दर आये। मगर लड़की ने आंखें नहीं खोली ट्रेन चल पड़ी।
लड़की के हाव भाव से साफ लग रहा था वो किसी का बहुत शिद्दत से इन्तज़ार कर रही थी।
ये मानवीय संवेदना का असर है कि किसी का दुःख अपना सा महसूस होता है। मुझे भी पता नहीं क्यों दुःख हुआ। मन ही मन दुआ की ईश्वर इससे जो बिछड़ गया है उसे मिला दें।
तभी मैने देखा सामने से एक लड़का हड़बड़ी में आसपास निगाहें दौड़ाता हुआ चला आ रहा है।
दूर से ही मेरी पास की सीट पर आंखें मूंदकर बैठी लड़की पर निगाह गई। उसने गहरी सांस ली सीने पर हाथ रख कर थोड़ा सहलाता हुआ वहां आ खड़ा हुआ। उसने लड़की के सर पर हौले से हाथ रखा। लड़की ने गर्दन ऊपर की, बंद पलकों को उठाकर पनीली अश्रुपूरित नेत्रों से लड़के को देखा।
लडका इधर उधर से निगाह चुराकर अपने कान पकड़े , देखकर लड़की ने आंखें नीचे कर ली। लड़के ने बैग में से पानी की बोतल निकाल कर लड़की की ओर बढ़ाई उसने ना में गर्दन हिलाई और फिर से आंखें मुंद ली। लड़का झुक कर धीरे से लड़की से बोला पी लो प्लीज़।सुबह के लिए मुझे माफ़ कर दो, मैं तुम पर चिल्लाया। लड़की ने बिना आंखें खोले बोतल पकड़ ली। चेहर से लग रहा था जैसे गहन पीड़ा में जल रही हो।
अपनी रफ़्तार से ट्रेन कभी रूकती कभी चलती जा रही थी। लड़का बीच-बीच में सूचना पट्टी पर निगाह डालता जा रहा था। जैसे ट्रेन की रफ्तार के साथ उसके हाथ से सब कुछ छूटता जा रहा हो।
इससे मुझे अंदाजा हो गया था की शायद इसका स्टेशन आने से पहले वो सब कुछ जल्द से जल्द ठीक करना चाहता है।
लड़की ने फिर आंखें मुंद ली,सर बेंच से टिका दिया।
लड़का बहुत बैचेन हो उठा।उसने फिर से कहां प्लीज़ सुनो ना -माफ़ कर दो आगे से जल्दी आऊंगा ,सोरी बोल रहा हूॅं, मैं सच कह रहा हूॅं मेरी गाड़ी खराब हो गई थी, दोस्त से लिफ्ट ली उससे कहा मुझे चौराहे पर उतार दे। बस इतना ही है देरी का कारण प्लीज़ प्लीज़....
लड़के का शब्द अटक गया गला रूंध सा गया।
अच्छा तुम बताओ और क्या करूं जिससे तुम सच मान लो। देखो आज मैंने लन्च तक नहीं किया दिखाऊं टीफिन, लड़का बैग में हाथ डालने लगा। लड़की ने हौले से उसके पैर को छूआ। मगर आंखें मुंदी रही।
किसकी कसम खाऊं मम्मी की,नहीं-नहीं मैं अपने सर की कसम खा रहा हूॅं कहने के साथ ही लड़के ने एक हाथ सिर पर और एक हाथ लड़की के हाथ पर रख दिया।
लड़की ने हड़बड़ा कर आंखें खोली। लड़के से आंखों ही आंखों में सिर से हाथ हटाने का आग्रह किया। आँखों से आँसु पोंछती हुई मुस्कुरा दी धीरे से बोली-पागल......
लड़का शरमाते हुए सिर खुजलाने लगा।
देखो -हमे बस चौबीस घंटे में ये एक घंटा मिलता है साथ बैठने को, बात करने को ईसे भी इस तरह गंवा देंगे....लड़की बोली -मैं भी तो यही कह रही हूॅं।
प्लीज़ ऐसे समय पर पहुंचकर ट्रेन मिस करोंगे तो....
लड़का बोला -तो क्या?
लड़की बोली - तो... तुमने अबकी बार ट्रेन मिस की और मुझे नहीं मिले तो मैं अपना रास्ता बदल लुंगी समझे।
लड़की ने अपने बैग से एक पैकेट निकाला, लड़के को पकड़ाया। लड़के ने कहा मैं नहीं खाता ये सब।लड़की ने कहा बाद में खा लेना।
लड़की बोली - मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया..क्या चाहते हो अब भी कुछ ना खाऊं....
लड़के ने झट से पैकेट चुपचाप अपने बैग में रख लिया साथ ही निगाह सूचना पट्टी पर भी डाली। दोनों के बीच के काले बादल छंट चुके थे। धीरे धीरे बातें होने लगी, कभी लड़की आंखें दिखाती कभी मुस्कुरा देती। लड़का कभी धीरे से हाथ को छूता कभी झुक कर करीब सरकता दोनों मुस्करा देते।इतने में ट्रेन से ऐलान हुआ अगला स्टेशन "द्वारका सेक्टर 10" है। दोनों ने बैग संभाले कंधे पर टांगे और उठ खड़े हुए, लड़की आगे आगे लड़का पीछे ऐसे चल रहा था जैसे कोई बीच में न आ जाए। लड़की की कमर पर दूर से घेरा बनाए प्रोटेक्ट करते हुए दोनों एक दूसरे की ओर देखते हुए अलग अलग दिशा में चल दिए! हाथ हिलाते हुए शायद कल फिर मिलने के वादे के साथ इसी मेट्रो के सफर में...!!
✍️उमेश श्रीवास्तव "पथिक"
सदस्य:- विश्व हिंदी परिषद्
मधु विहार,द्वारका,नई दिल्ली

