विमर्श: क्या बेटे को बिहार में मंत्री पद दिलाने के लिए आनंद मोहन का सक्रिय होना उचित है?
✍️राजीव कुमार झा (एम.ए. जनसंचार)
देश की राजनीति में परिवारवाद का प्रभाव लोकतंत्र को निरंतर खोखला करता दिखाई दे रहा है। लगभग सभी दलों के नेता अपने बेटे, बेटियों, दामादों और भाई-भतीजों को राजनीति में आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। इसी माहौल में बिहार के नेता Anand Mohan Singh ने Nitish Kumar पर अपने बेटे Chetan Anand के साथ धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री ने उनके जदयू विधायक पुत्र चेतन आनंद को सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में मंत्री नहीं बनवाया।
सवाल यह है कि आनंद मोहन आखिर किस प्रकार का आरोप लगा रहे हैं? उनके बयान से स्पष्ट रूप से यह संदेश जाता है कि वह राजनीतिक लेन-देन में बेईमानी का आरोप लगा रहे हैं। क्या इस तरह की भाषा और आरोप सार्वजनिक जीवन में उचित माने जा सकते हैं?
आनंद मोहन को तेज स्वभाव वाला नेता माना जाता रहा है। बिहार में अनेक विधायक मंत्री नहीं बन पाए, लेकिन किसी ने भी इस प्रकार की अशोभनीय टिप्पणी करना उचित नहीं समझा। सहरसा लोकसभा चुनाव में चन्द्र किशोर पाठक से हारने के बाद आनंद मोहन और उनके समर्थकों ने तत्कालीन जिला प्रशासन पर मतगणना में हेरफेर का आरोप लगाया था। उस समय देश में Rajiv Gandhi की लहर थी और कई बड़े नेता चुनाव हार गए थे।
आज राजनीति में यह प्रवृत्ति आम हो गई है कि नेता अपने परिवार के सदस्यों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास करते हैं। स्वयं Lalu Prasad Yadav और Nitish Kumar पर भी परिवारवाद के आरोप लगते रहे हैं। यह अलग बात है कि आनंद मोहन का अंदाज लोगों को असहज करता है। दुनिया जानती है कि आनंद मोहन को राजनीतिक रूप से पुनर्जीवन दिलाने में नीतीश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अन्यथा उनका पूरा जीवन जेल में ही बीत सकता था।
जब चेतन आनंद बिहार विधानसभा में अपने पिता की रिहाई की मांग उठाते थे और यह मामला जोर पकड़ने लगा, तब Vijay Kumar Sinha ने आनंद मोहन को बेगुनाह बताते हुए कहा था कि लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली सरकार ने उन्हें फंसाया था। हालांकि न्यायपालिका को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय देना पड़ता है।
आनंद मोहन की रिहाई के साथ कई अन्य लोग भी जेल से बाहर आए और उनमें से कुछ राजनीति में सक्रिय हैं। लगभग सभी दलों में ऐसे लोगों की मौजूदगी है। इस पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ जनता को भी विचार करना होगा कि वह किन लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाना चाहती है।
इन दिनों आनंद मोहन फिर नई पार्टी बनाने की बात कर रहे हैं। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि बिहार पीपुल्स पार्टी के गठन के समय उनके साथ किस तरह के लोग सक्रिय थे। आनंद मोहन को पढ़ा-लिखा व्यक्ति माना जाता है, लेकिन उनके राजनीतिक आचरण में अक्सर संतुलन की कमी दिखाई देती रही है। इसके बावजूद समाज के एक वर्ग ने हमेशा उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त की। भाजपा नेता Jaswant Singh ने भी उनके आजीवन कारावास को समाप्त करने की मांग की थी।
जब राजद से गठबंधन तोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश किया था, तब राजद विधायक चेतन आनंद और नीलम देवी ने मतदान में हिस्सा नहीं लेकर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार गठन में सहयोग किया था। लेकिन सवाल यह है कि उस समय वे किस पार्टी के विधायक के रूप में विधानसभा में मौजूद थे? अपनी ही पार्टी के खिलाफ इस प्रकार का रुख क्या उनके राजनीतिक चरित्र पर प्रश्नचिह्न नहीं खड़ा करता?
गनीमत रही कि उस समय यह मामला ज्यादा नहीं बढ़ा और बिहार में जदयू-भाजपा सरकार का गठन हो गया। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक ऐसे मामलों में दलीय निष्ठा तोड़कर दूसरे खेमे को मदद पहुंचाने की प्रवृत्ति को अनैतिक मानते हैं। साथ ही, ऐसी घटनाओं में अक्सर राजनीतिक सौदेबाजी और लेन-देन की आशंकाएं भी व्यक्त की जाती हैं।

