विश्व कविता दिवस पर शब्दभूमि की संगोष्ठी, समकालीन कविता में सामाजिक बदलाव पर मंथन
कोलकाता (पश्चिम बंगाल): कोलकाता में विश्व कविता दिवस के अवसर पर शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा आयोजित ऑनलाइन संगोष्ठी में ‘समकालीन कविता में सामाजिक परिवर्तन की चेतना’ विषय पर देशभर के साहित्यकारों ने गहन विमर्श किया। इस आयोजन में विभिन्न राज्यों से जुड़े रचनाकारों, शोधकर्ताओं और साहित्य प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, जिससे कार्यक्रम एक व्यापक साहित्यिक संवाद का मंच बन गया।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. रेखा कुमारी त्रिपाठी ने की, जिन्होंने विश्व कविता दिवस के इतिहास और उसके वैश्विक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कविता केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त अंतर्विरोधों को उजागर करने और परिवर्तन की चेतना जगाने का सशक्त माध्यम है। उनके वक्तव्य ने संगोष्ठी की दिशा और उद्देश्य को स्पष्ट रूप से स्थापित किया।
संगोष्ठी में सपना चंदेल, जया कुमारी, शांति सोनी, प्रीति साहू, प्रियंका सिंह, शोभा डी., डॉ. महेंद्र रणदा, डॉ. जया सुभाष बागुल, नितिन सुभाषराव कुंभकर्ण, डॉ. मनोज प्रभाकर ढोने, आनंद कुमार जैन, डॉ. रुचि पालीवाल और अमन कुमार सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार साझा किए। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि समकालीन कविता केवल सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक अन्याय, असमानता, स्त्री-विमर्श, पर्यावरण संकट और मानवीय मूल्यों के क्षरण जैसे गंभीर मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप करती है।
कार्यक्रम के सफल संचालन में प्रिया श्रीवास्तव ने संयोजक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि अंत में विनोद यादव ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने इस प्रकार के आयोजनों को साहित्यिक संवाद को समृद्ध करने और नई पीढ़ी में रचनात्मक चेतना विकसित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
यह संगोष्ठी न केवल एक साहित्यिक आयोजन रही, बल्कि समकालीन कविता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की संभावनाओं पर गंभीर और सार्थक विमर्श स्थापित करने में भी सफल साबित हुई।
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