26 मार्च जन्मतिथि पर विशेष
आधुनिक मीराबाई महादेवी वर्मा
महादेवी वर्मा का विरह कौशल (गीतिकाव्य के संदर्भ में)
परिचय
जन्म: 26 मार्च 1907, फर्रुखाबाद (उ.प्र.)
मृत्यु: 1987
काव्य संग्रह
* नीहार - 1930
* रश्मि - 1932
* नीरजा - 1934
* सांध्यगीत - 1936
* यामा - 1936 (ज्ञानपीठ पुरस्कार)
* दीपशिखा - 1942
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हिंदी साहित्य के छायावादी युग की महान प्रतिभा सम्पन्न कवयित्री महादेवी वर्मा का विरह काव्य असीम दुःख, वेदना और करुणा को हृदय की अतल गहराइयों से यूं निःसृत करता है मानो कोई अनमोल और अक्षय खजाना कहीं किसी अदृश्य संसार में बिखरा पड़ा हो और जिसका पता केवल वही जानती हों। वे वहां जाती हैं और रत्न बटोर लाती हैं। विरहानुभूतियों का एक ऐसा पैमाना कवयित्री के हाथ लग गया है जिसका ताप और माप उसे बखूबी मालूम है। उनकी काव्यमयी अभिव्यक्तियाँ अनंत ऊँचाइयों की ओर यूं उछाले मारती हैं जैसे समन्दर में उठे ज्वार ने सचमुच आकाश छू लिया हो। परन्तु, सब जानते हैं कि एक छोटी सी लहर भी ज्वार के उठने का कारण बन सकती है। अगर कवि की चेतना थोड़ी भी प्रशिक्षित हुई तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं अन्यथा तो अपार संभावनाओं को अपने में समेटे वह शक्तिबीज भी अपने जीवन प्रेरक तत्वों को खो देता है।
असीम दुःख और असीम वेदना का भाव महादेवी जी के गीतिकाव्य का प्राणतत्व है। यहां वे साहित्य परंपरा में करुण रस के स्थायी भाव का आश्रय न लेकर भारतीय दर्शन से प्रेरणा पाती हैं। उन्होंने लिखा भी है- “मुझे दुःख के दोनों ही रूप प्रिय हैं, एक वह जो मनुष्य के संवेदनशील हृदय को सारे संसार से एक अविच्छिन्न बंधन में बांध देता है और दूसरा, वह जो काल और सीमा के बंधन में पड़े हुए असीम चेतन का क्रंदन है।” महादेवी जी अपनी वेदना को समस्त विश्व की वेदना में मिला देना चाहती हैं, यहीं से उनके काव्य में करुणा का भाव विकसित होता है।
> "विश्ववीणा में अपनी आज, मिला लो यह अस्फुट झंकार।"
> 'विरह का जलजात जीवन, वेदना में जन्म मिला, करुणा में आवास,
> अश्रु चुनता दिवस इसका, अश्रु गिनती रात।'
दरअसल यह करुणालय महादेवी को गौतम बुद्ध के संदेश और पूर्ववर्ती भक्ति साहित्य में भाव साधना की लोकोन्मुख परंपरा से प्राप्त होता है। वे बौद्ध दर्शन से गहरे प्रभावित थीं और भिक्षुणी बनना चाहती थीं।
> "एक करुण अभाव में चिर-तृप्ति का संसार संचितः
> एक लघु क्षण दे रहा निर्वाण के वरदान शत-शत् :
> पा लिया मैंने किसे इस वेदना के मधुर क्रय में ?
> कौन तुम मेरे हृदय में ?"
महादेवी को आधुनिक मीरा भी इसीलिए कहा जाता है। महादेवी और मीरा दोनों ही लौकिक व सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त प्रेम की महादशाओं की चिरविरहणियां हैं। एक ने हमारी जातीय संस्कृति व भारतीय समाज में व्याप्त श्री कृष्ण की लोक प्रसिद्ध छवि को अपने हृदय में बसाकर न केवल भक्तिकालीन साहित्य को, न केवल तत्कालीन जनसमाज को, बल्कि इससे भी बढ़कर भारतीय धर्म व अध्यात्म की प्रचलित नीरस शास्त्रीय परंपरा को प्रेमाभक्ति की भावविभोर कर देने वाली सरस काव्यांजली भेंट की है, तो दूसरी ने अपने निकटस्थ संसार से प्राप्त वेदना की अन्तर्दशा को ज्ञान की दीपशिखाओं से प्रज्वलित कर अपने अन्तर्लोक में प्रवेश किया और अलौकिक के मार्ग पर दूर तक निकलती चली गईं। असीम वेदना से प्राप्त असीम करुणा का भाव लेकर वे समस्त विश्व की वेदना से स्वयं को जोड़ती हैं, वेदना में ही उन्हें आनंद है। लौकिक जीवन की कारा में पड़ी उनकी अलौकिक पीड़ाएं उन्हें रहस्यवादी बना देती हैं।
पाश्चात्य स्वच्छन्दतावाद की जिस पृष्ठभूमि पर छायावाद का आविर्भाव हुआ, उसमें भावनाओं का जबरदस्त विस्फोट था। प्रसाद, पंत, निराला, भावों की स्वच्छंदता के समर्थक थे जबकि महादेवी में भाव संगोपन या भाव-संकोच की प्रवृत्ति थी। 'काव्य में रहस्यवाद' नामक लेख में आचार्य शुक्ल ने लिखा कि- "कविता में रहस्यवाद भावों की उन्मुक्ति या प्रकाश की नहीं, भावों को छिपाने की कला है।" निराला का तो यहां तक मानना था कि रहस्य वास्तव में पहुँचे हुए लोगों के लिए रहस्य नहीं, साधारण सत्य है। रहस्यवादी काव्य को छायावाद का दूसरा सोपान बताते हुए महादेवी 'यामा' की भूमि में लिखती हैं- "रहस्यवाद आत्मा का गुण है, काव्य का नहीं।" छायावाद यदि आत्मसजगता की कविता है तो रहस्यवाद आत्मविसर्जन की परम सिद्धि। आत्मविसर्जन की यही परंपरा आगे चलकर 'अज्ञेय' की 'असाध्य वीणा' में प्रकट होती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार-
"इस वेदना को लेकर उन्होंने हृदय की ऐसी अनुभूतियां सामने रखीं, जो लोकोत्तर हैं। कहाँ तक वे वास्तविक अनुभूतियां हैं और कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना, यह नहीं कहा जा सकता।"
अनुभूतियों की इस सच्चाई को लेकर आचार्य शुक्ल ने जो संदेह व्यक्त किया है वह एक आलोचक की सधी हुई दृष्टि है, सटीक विश्लेषण है। आलोचक ने अपना धर्म निभाया है, पर कवि के दृष्टिकोण से अगर सोचें तो कल्पना से ही कवित्व में निखार आता है। कवि का कल्पना वैभव ही उसकी काव्य संपदा में वृद्धि करता है। कहने का तात्पर्य यह कि दुःख की कल्पना भी दुःख की अनुभूति का एहसास दे जाती है। अगर कवि ने कल्पना की उड़ान के इस जादू को जान लिया है तो इसे उसकी प्रतिभा और अभ्यास का कमाल ही कहा जायेगा। कवि का तो निवास ही कल्पना लोक में होता है। यथार्थ से यह प्रेरणा पाता है, दुःख और वेदना के स्रोत ढूंढता है और आनंद के इस लौकिक सुख की साधना में अगर वह अलौकिक तक पहुंच जाता है, अपने ही केंद्र में प्रवेश कर जाता है तो यहां उसका अन्तर्लोक ही खुलकर सामने आता है। अन्तर्लोक का यह प्राकट्य माना कि सामान्य हृदय से उच्च भूमि पर स्थित होता है परन्तु, लोक जीवन से उसका नाता फिर भी एक दूरगामी दिशासूचक है।


