घोड़ा लुटावन पुत्र पावन मेला: अनोखी परंपरा में उमड़ी आस्था, मिट्टी के घोड़ों से मांगी जाती है मन्नत
सारण (बिहार) संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी: बिहार के सारण जिले में लोक आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम इन दिनों देखने को मिल रहा है। जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर तरैया प्रखंड के बनिया हसनपुर गांव में चैत नवमी और दशमी के अवसर पर आयोजित होने वाला प्रसिद्ध “घोड़ा लुटावन पुत्र पावन मेला” श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इस मेले में खासकर संतान, विशेष रूप से पुत्र प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपतियों की भारी भीड़ उमड़ रही है।
शुक्रवार को नवमी के दिन दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं ने पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। पूजा स्थल पर भगत राम आशीष सहनी द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन कर पूजा की शुरुआत की गई, जिसके बाद चावल और दूध से बनी खीर अमरनाथ बाबा को अर्पित की गई। पूजा के उपरांत जिन श्रद्धालुओं की मन्नत पूरी हो चुकी थी, उन्होंने मेले से मिट्टी के दो घोड़े (एक जोड़ा) खरीदकर बाबा को अर्पित किया।
मेला आयोजन समिति के व्यवस्थापक मुकेश सहनी और भगत मुसाफिर सहनी के अनुसार इस मेले की सबसे अनोखी परंपरा “घोड़ा लुटाना” है। श्रद्धालु बाबा को चढ़ाए गए मिट्टी के घोड़ों में से एक घोड़ा ‘लूट’ कर अपने घर ले जाते हैं। मान्यता है कि इस घोड़े को लाल कपड़े में लपेटकर सुरक्षित स्थान पर रखने से पुत्र प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है। मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु पुनः मेले में आकर दो घोड़े चढ़ाते हैं। केवल नवमी के दिन ही लगभग एक हजार से अधिक मिट्टी के घोड़ों की बिक्री हुई, जबकि दशमी के दिन इससे भी अधिक भीड़ उमड़ने की संभावना जताई जा रही है।
इस मेले का आयोजन गांव के उत्तरी भाग में नवमी और दक्षिणी भाग में दशमी के दिन किया जाता है, जहां हजारों श्रद्धालु जुटते हैं। सारण के अलावा गोपालगंज, सिवान और मुजफ्फरपुर सहित कई जिलों से लोग यहां पहुंचते हैं, जिससे यह मेला क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि अंतर-जिला आस्था का केंद्र बन चुका है।
स्थानीय लोगों के अनुसार अमरनाथ बाबा की यह स्थल समाधि मानी जाती है। मान्यता है कि प्राचीन काल में युद्ध में पराजित होने के बाद उन्होंने इसी स्थान पर अंतिम सांस ली थी और अपनी अंतिम इच्छा के रूप में हर वर्ष चैत नवमी और दशमी को पूजा किए जाने की बात कही थी। तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।
मेले के सफल आयोजन में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों के साथ-साथ प्रशासन और पुलिस की भी सक्रिय भूमिका देखी जा रही है, जिससे श्रद्धालुओं को सुरक्षित और व्यवस्थित वातावरण में पूजा-अर्चना का अवसर मिल रहा है।

