नाटक (गीत)
‘नाटक’ चलता सुख-दुख का
यह जगत सरायखाना है।
ना गाड़ी ना चालक अपना,
ना किसी का को॓ई ठिकाना है।।
माया की दलदल में फंसता,
‘मैं’ को हरदम साथ में रखता।
पैर पटकता हाथ झटकता,
हार को अपनी जीत समझता।
जन्म-जन्म से भटके मन को-
हुआ यह रोग पुराना है।।
निर्मल पावन सृष्टि कारक,
ब्रह्मांड की अपनी कहानी है।
जीते-मरते जीव यह पीता
कर्मो के घट का पानी है।
श्वास प्राण में गति बदलता,
जीवन को आना जाना है।।
स्पंदन बहे शिराओं में..
भरता ओज शिखाओं में,
होम किया जब अहं ने ‘मैं’ को
अंबर का तेज दमकता है।
सागर से है मंथन गहरा
परि-वर्तन रूप बदलता है।।
गंध प्रेम की वितरित कर दे,
वह सूरज की वेणी है।
शीतल करुण सरस बहे जो,
नदी नहीं वो त्रिवेणी है।
ब्रह्म-प्रिया के प्रियतम जाने
हीरा कब कैसे मिलता है।।

