वैश्विक मंच पर हिंदी का उद्घोष: विश्व हिंदी परिषद सम्मेलन में संस्कृति और एकता का संदेश
नई दिल्ली: हिंदी को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, संस्कृति और सामाजिक एकता की सशक्त धुरी बताते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख श्री सुनील अम्बेकर ने कहा कि हिंदी समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक शक्ति है, जो देश की चेतना, परंपरा और मूल्यों को एक सूत्र में पिरोती है। वे विश्व हिंदी परिषद के तत्वावधान में आयोजित गरिमामय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे, जो परिषद के ध्येयगीत की गूंज और वैचारिक विमर्श के साथ भव्य रूप से संपन्न हुआ।
सम्मेलन का शुभारंभ विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. विपिन कुमार के ओजस्वी स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने हिंदी को भारत की आत्मा बताते हुए इसे वैश्विक संवाद का सेतु और “मानवता, शांति एवं वसुधैव कुटुम्बकम” की संवाहक भाषा के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हिंदी भारत की भाषायी विविधता को समेटते हुए विश्व मंच पर भारतीय विचार और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम है।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण परिषद का ध्येयगीत रहा, जिसकी रचना स्वयं डॉ. विपिन कुमार ने की। प्रख्यात संगीतकार गायत्री जी द्वारा प्रस्तुत इस भावपूर्ण ध्येयगीत ने सभागार को हिंदीमय वातावरण से सराबोर कर दिया। “जयति जय जय – विश्व भाषा हिंदी! हिंदी है हम – विश्व भाषा हमारी!” जैसे प्रेरक उद्गारों के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक एकता, भाषायी समरसता और विश्व गुरु भारत के संकल्प को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
सम्मेलन की अध्यक्षता भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने हिंदी को राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला बताते हुए इसके वैश्विक प्रसार के लिए निरंतर, संगठित और संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी के माध्यम से ही भारत की बौद्धिक परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त किया जा सकता है।
मुख्य अतिथि सुनील अम्बेकर ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी जन-जन की भाषा है और सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता तथा सांस्कृतिक आत्मबोध को मजबूत करने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने हिंदी को केवल संप्रेषण की भाषा नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना की वाहक बताया।
कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद श्री सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि हिंदी भारत की वैचारिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति है। उन्होंने हिंदी के माध्यम से भारत के दर्शन, बौद्धिक परंपरा और जीवन-मूल्यों को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए विश्व हिंदी परिषद के प्रयासों की सराहना की। राज्यसभा सांसद डॉ. संगीता बलवंत ने भी परिषद द्वारा हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विस्तार और नई पीढ़ी को भाषा से जोड़ने के प्रयासों को सराहनीय बताया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की बढ़ती स्वीकार्यता को रेखांकित करते हुए नेपाल के राजदूत श्री शंकर प्रसाद शर्मा, उज्बेकिस्तान के राजदूत श्री सरदार रुस्तमवायेव तथा गुयाना के राजदूत श्री धरम जी की गरिमामयी उपस्थिति ने सम्मेलन को वैश्विक पहचान प्रदान की। वहीं भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री बलदेव पुरुषार्थ की उपस्थिति भी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।
कार्यक्रम का संयोजन डॉ. रश्मि सलूजा ने किया, जिनके कुशल प्रबंधन से अल्प समय में ध्येयगीत सहित संपूर्ण आयोजन भव्य और सुव्यवस्थित रूप से संपन्न हुआ। इस अवसर पर आईसीपीआर सदस्य प्रो. सच्चिदानंद मिश्रा, डॉ. पूजा व्यास, केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक डॉ. सुनील कुलकर्णी, हंसराज महाविद्यालय की प्रो. रमा शर्मा, पी.जी.डी.ए.वी. महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. आर.के. गुप्ता तथा भारतीय योग संस्थान के अध्यक्ष श्री देशराज सहित अनेक शिक्षाविद् और विद्वान उपस्थित रहे।
परिषद की ओर से बताया गया कि प्रतियोगिता आयोजकों को प्रमाणपत्र एवं स्मृतिचिह्न तकनीकी कारणों से तत्काल प्रदान नहीं किए जा सके हैं। शीघ्र ही विश्व हिंदी परिषद कार्यालय में सभी को आमंत्रित कर विधिवत सम्मानित किया जाएगा। परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. श्रवण जी ने परिषद पंचांग, संवाद एवं समन्वय के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रीति तोमर ने किया, जबकि संपूर्ण आयोजन का समन्वय डॉ. हर्ष बाला द्वारा किया गया। अंत में परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देवी प्रसाद मिश्र ने भावपूर्ण धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया, जिसके साथ यह गरिमामय सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

