पैबंद
उधार की खुशी,
बनावटी छवि
और दिखावे से भरे,
यह जीवन के रंगमंच।
मचलती हसरतें-
भटकती निगाहें,
मुखौटे लिए फिरते हैं
जाने कितने अनुबंध?
बेहोशी के धुएं में
चलते हुए कहते हैं
खुद को कुछ,
सबसे अक्लमंद।
सिर्फ कहने में
चाहिए असर,
हो चाहे बिन अम्ल के
मानो जीत ली हो जंग।
ऐ ज़िदगी बता!
है क्या यही
तुझको जीने का ढंग?
हो रहीं कैद ख्वाहिशें
बिन उम्मीदों के कहीं,
दौड़ में अंधी नुमाईशों
के हो रहे जलसे कहीं।
उफन रहा दरयाॅ कहीं
और सर्द ज़मी को
मिला न उसका बागबाॅ कहीं।
लग रहे आसमाॅ को भी जहाॅ तहाॅ..
अंगारों के सुर्ख पैबंद।।
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✍️ डाॅ. कंचन मखीजा
रोहतक,हरियाणा

