संस्मरण
दो हज़ार छह ने की दो हज़ार छब्बीस से मुलाकात
✍️ डाॅ. कंचन मखीजा हरियाणा
सत्रह वर्षों बाद, वह कक्षा फिर से जीवंत हो उठी, लेकिन इस बार यह किसी प्रवक्ता के वक्तव्य की गूंज नहीं थी, ना ही किसी उद्ण्ड विद्यार्थी को गलती का एहसास कराने के लिए किया गया क्रोध। बल्कि यह आवाज़ थी उन खुशनुमा यादों की और कृतज्ञता से भरे उन हृदयों की, जिनकी हँसी के ठहाके अपनी पहले की नादानियों पर पूरे वातावरण को यह सोचने पर मजबूर कर रहे थे कि आज कुछ तो खास बात है मगर क्या? चेहरे बदल चुके थे, पहचान पाना मुश्किल था कि कौन सुरेंद्र है कौन रवि और कौन विजय। बदलते समय ने उम्र की छाप छोड़ दी थी, परंतु इतने वर्षो बाद अपनी टीचर से मिलने आने का यह पुनर्मिलन आज भी समाज को शिक्षक और शिष्यों के अटूट बंधन और अपने संस्कारों की गरिमा का परिचय दे रहा था। कोई दिल्ली, कोई हिसार यहाँ तक कि कोई ऑस्ट्रेलिया से इस रीयूनियन में पहुंचा। एक-एक करके जब छात्रों ने अपनी शुभकामनाएँ और भाव व्यक्त किए, तो हर शब्द में सम्मान और अपनापन झलक रहा था। यादों को दोहराते एवं उपलब्धियों के लिए किये गये अपने छात्रों के संघर्ष और जीवन के अनुभवों को सुनकर आंखें रह रह कर नम हो आई। यह केवल एक भेंट नहीं बल्कि एहसास था असीम आनंद व संतोष का कि वर्षों पहले दी गई शिक्षा, बांटा हुआ ज्ञान, आज उनके जीवन की सार्थक उपलब्धियों में परिवर्तित हो चुका है। आँखों में खुशी के आँसू, चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान और हृदय को था गौरव का अनुभव। वह क्षण था एक सुंदर अनमोल उपहार जब अपनी टीचर के सामने खड़े थे बार बार प्रणाम् करते, आभार जताते हुए उसके सत्रह वर्ष पुराने विद्यार्थी, एक नई शुरुआत का सपना लेकर ।

