आध्यात्मिक शक्ति का परिचय: बलिदान की अमर कहानियाँ
/// जगत दर्शन न्यूज
हिंदुस्थान के वीरों की अमर कहानियाँ, भय से मुक्ति का द्वार व आध्यात्मिक शक्ति का परिचय है। शहादत के इसी शाश्वत और आध्यात्मिक पक्ष का एक ऐसा ही उदाहरण हैं सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों छोटे साहिबजादे, बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह। इन बाल वीरों की कहानी मात्र एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि आत्मा की अजेयता और धर्म के नाम पर प्राणों का उत्सर्ग कर देने वाली उस चेतना का प्रतीक है, जो भारतीय आध्यात्मिक चिंतन का मूल आधार रही है। यह उस आंतरिक दृढ़ता, विश्वास और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का परिणाम है, जो मृत्यु के भय को भी तुच्छ बना देती है।
यह घटना सन् 1704 की है। गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके परिवार पर मुगल सेना ने हमला किया। इस अव्यवस्था में गुरु का परिवार बिछड़ गया। गुरु माता गुजरी जी ने अपने दोनों नन्हें पोतों 7 वर्ष के जोरावर सिंह और 5 वर्ष के फतेह सिंह को लेकर एक सेवक के घर शरण ली, पर सेवक ने लालच का शिकार होकर, दोनों साहिबजादों और उनकी दादी को सरहिंद के नवाब वज़ीर खान के हवाले कर दिया। नवाब ने उन्हें एक खुले बुर्ज पर पूस की कठोर सर्दी में कैद रखा। यहीं, माता गुजरी ने अपने पोतों को धर्म और सिद्धांतों पर अडिग रहने की अंतिम शिक्षा दी। परिणाम साहस और शहादत। नवाब वज़ीर खान ने अनेक प्रलोभन और धमकियों के बाद भी, उस नन्ही आयु में भी दोनों साहिबजादों ने बहादुरी से सत श्री अकाल के जयकारे लगाते हुए, अपना धर्म बदलने से इन्कार कर दिया। अपनी हर कोशिश विफल होते देख, नवाब ने 26 दिसंबर 1704 को दोनों बालकों को जीवित दीवार में चिनवा देने का आदेश दे दिया। 27 दिसंबर कोउन्हें दीवार में जीवित चिनवा दिया गया। यह खबर मिलते ही माता ने भी अपने प्राण त्याग दिए। इसके अलावा दूसरी ओर उन गहरी अंधेरी रातों में बाबा मोती राम मेहरा, उनकी माँ और उनकी पत्नी बीबी भोली जी अपनी जान को दांव पर रख चुपके से दूध और पानी ठंडे बुर्ज तक लेकर पहुँचे। बाबा मोती राम मेहरा को उनके माता-पिता, पत्नी बीबी भोली जी और छोटे बेटे सहित गिरफ़्तार कर लिया गया। उनसे कहा गया, “अगर जान चाहते हो, तो गुरुओं से नाता तोड़ लो।” उत्तर मिला, “जिस धर्म ने मुझे इंसान बनना सिखाया, उससे मुँह मोड़कर मैं सांस नहीं लेना चाहता।” और फिर, पूरा परिवार वजीर खान के ज़ुल्म का शिकार बना। अमर थी उस सेवक की सेवा और श्रद्धा।
इस प्रकार, एक सेवक परिवार और नन्हें बालकों ने अपने धर्म और सिद्धांतों की रक्षा के लिए, हंसते-हंसते अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। ऐसे शौर्य सेवा और भक्ति को शत् शत् नमन। शहादत का वह क्षण आत्मा का अपने स्रोत, परमात्मा से पुनर्मिलन का क्षण था। बाबा जोरावर सिंह और फतेह सिंह के लिए, दीवार में चुनना शारीरिक मृत्यु नहीं, बल्कि एक शाश्वत जीवन में प्रवेश था। भौतिक रूप से पराजय जैसी दिखने वाली इस घटना ने आने वाली शताब्दियों तक समाज के मन-मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ी। यह सिद्ध करता है कि सत्य और नैतिकता की अंतिम विजय होती है। धर्म का अर्थ केवल बाहरी आडंबर या जन्म से मिली पहचान नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है आंतरिक सत्य, न्याय और नैतिक सिद्धांतों के प्रति अटल निष्ठा,रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देना ही सच्ची शहादत है। यह बलिदान की घटना बताती है कि जब व्यक्ति ईश्वर में पूर्ण समर्पण कर देता है, तो मृत्यु का भय उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उसकी आत्मा अमर हो जाती है।साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह की शहादत मानवीय आत्मा की उस अदम्य शक्ति का प्रमाण है, जो सांसारिक बंधनों को तोड़कर शाश्वत ज्योति में विलीन हो जाती है।
(हर वर्ष 26 दिसंबर का दिन वीर बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। सन् 2022 से, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद, यह दिन राष्ट्रीय स्तर पर इन बाल शहीदों की स्मृति को समर्पित है।)

