सरयू किनारे आज भी जिंदा है नाव बनाने की पुश्तैनी कला, 30 हजार में तैयार होती है लकड़ी की नाव
सारण (बिहार) संवाददाता वीरेश सिंह: आधुनिक दौर में जहां पारंपरिक हुनर धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं, वहीं मांझी प्रखंड के छोटकी फुलवरिया गांव में नाव बनाने की पुश्तैनी परंपरा आज भी कायम है। गांव के कारीगर शीशम की लकड़ी से नाव तैयार कर न केवल अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही अपनी कला और परंपरा को भी जीवंत रखे हुए हैं।
नाव बनाने वाले कारीगर राजकिशोर साहनी ने बताया कि एक छोटी नाव तैयार करने में करीब छह से सात दिन का समय लगता है। इसे बनाने में लगभग 30 हजार रुपये की लागत आती है। नाव को मजबूत और जलरोधक बनाने के लिए रुई, जूट और अलकतरा समेत अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।
कारीगर के अनुसार, शीशम की लकड़ी से तैयार नाव काफी टिकाऊ होती है और सामान्य इस्तेमाल में करीब सात वर्षों तक इसमें किसी बड़े खर्च की जरूरत नहीं पड़ती। उन्होंने बताया कि नाव बनाने की यह कला उनके गांव में पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी कई लोग इसी पारंपरिक हुनर से जुड़े हुए हैं।
सरयू नदी से जुड़ी है ग्रामीणों की आजीविका
छोटकी फुलवरिया गांव में मल्लाह समुदाय के लोगों की संख्या अधिक है। समुदाय के कई परिवार आज भी सरयू नदी में मछली पकड़कर अपनी आजीविका चलाते हैं। नदी से पकड़ी गई मछलियों को स्थानीय व्यापारी खरीद लेते हैं, जिससे परिवारों का भरण-पोषण होता है।
ग्रामीणों के लिए नाव केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि उनकी पुश्तैनी जीविका और जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। नाव निर्माण और मछली पकड़ने का काम आज भी गांव की पारंपरिक अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
इस दौरान चंदन सिंह, अजीत सिंह, मदन साहनी, कृष्णा साहनी, रामएकबाल साहनी समेत दर्जनों लोग मौजूद रहे।

