जन्माष्टमी: द्वापर युग के बालसखा से लेकर आधुनिक आधुनिकता के उल्लास तक का सफर
✍️ धर्मेंद्र रस्तोगी
देशभर में भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का पर्व पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर हर घर और गली में एक अनोखा ही उत्साह देखने को मिलता है, जहां अभिभावक अपने नन्हे- मुन्नों को कान्हा और राधा की सुंदर पारंपरिक वेशभूषा में सजाकर इस उत्सव को जीवंत बनाते हैं। बच्चों के इन मनमोहक स्वरूपों में साक्षात भगवान की झलक दिखाई देती है, जो हर किसी के मन को मोह लेती है। लेकिन समय के साथ इस उत्सव के स्वरूप और इसके मनाने के तौर- तरीकों में अतीत से वर्तमान तक एक दिलचस्प बदलाव आया है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पौराणिक अतीत:
प्राचीन काल और द्वापर युग में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आधार पूरी तरह से आध्यात्मिक, मौन साधना और मध्यरात्रि के योग पर केंद्रित था। शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था, तब गोकुल और वृंदावन में ग्वाल- बालों और गोपियों ने नंद बाबा के घर आनंद उत्सव मनाया था। इतिहास गवाह है कि उस दौर में उत्सव का मुख्य केंद्र मक्खन चोरी की लीलाएं, दही- हांडी का पारंपरिक आयोजन और गायों की सेवा हुआ करता था। लोग अपने घरों में प्राकृतिक रंगों, फूलों और पारंपरिक वस्त्रों से भगवान का श्रृंगार करते थे। यह उत्सव केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि समाज को एकसूत्र में पिरोने और प्रेम का संदेश देने का माध्यम था।
आधुनिक युग में बदलता स्वरूप और बाजारवाद:
वर्तमान समय में जन्माष्टमी का यह पावन पर्व आधुनिकता और सोशल मीडिया के दौर से जुड़ चुका है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में भी इस त्योहार के प्रति लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ है, बल्कि इसका दायरा और अधिक व्यापक हो गया है। आज स्कूलों, सोसाइटी और अपार्टमेंट्स में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं का दौर है, जहां बच्चों को श्रीकृष्ण और राधा के रूप में सजाने के लिए बाजारों में डिजाइनर पोशाकों और आधुनिक आभूषणों की भरमार रहती है। माता-पिता अपने बच्चों की इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर साझा कर अपनी खुशी जाहिर करते हैं।
संस्कृति और आधुनिकता का सुंदर संगम:
भले ही तौर- तरीके बदल गए हों और आधुनिकता ने पारंपरिक उत्सव में अपनी जगह बना ली हो, लेकिन इस पर्व की मूल भावना आज भी उतनी ही पवित्र है। बच्चों को कान्हा बनाना सिर्फ एक फैशन या शौक नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, पौराणिक कथाओं और संस्कारों से जोड़ने का एक सुंदर माध्यम है। यह अतीत की उस परंपरा को वर्तमान से जोड़ता है जहां हर बच्चा अपने भीतर भगवान श्रीकृष्ण के उस बालरूप को संजोता है जो पूरी मानवता को प्रेम और आनंद का पाठ पढ़ाता है।

