खाकी जब उम्मीद बन जाए, बाढ़ में डीएसपी अभिषेक कुमार की मिसाल ने जगाया जन- विश्वास
सारण (बिहार) संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी: बिहार के अधिकांश जिले बाढ़ की विभीषिका झेल रही है, जिला से लेकर राज्य तक के अधिकारी पूरी तरह से मुस्तैद होकर बचाव और राहत कार्य में जुटे हुए हैं। हालांकि सारण जिले की एक घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वर्दी का असली गौरव कागजी आदेशों में नहीं, बल्कि जमीन पर आम जनता के आंसुओं को पोछने और उनके संकट को साझा करने में ही निहित है। डीएसपी मुख्यालय अभिषेक कुमार का यह समर्पण सारण ही नहीं, बल्कि पूरे पुलिस महकमे के लिए कर्तव्यनिष्ठा की एक अनूठी मिसाल बन गया है, जो लंबे समय तक याद रखी जाएगी।
आपदा के वक्त जब आसमान से पानी बरस रहा हो और धरती पर बाढ़ का सैलाब जिंदगी को लीलने पर आमादा हो, तब खाकी सिर्फ एक वर्दी नहीं रहती, वह उस डूबते इंसान के लिए तिनका नहीं बल्कि मजबूत सहारा बन जाती है। सारण जिले के दिघवारा प्रखंड अंतर्गत त्रिलोकचक गांव स्थित माही नदी का तटबंध टूटने के बाद कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला है, जहां प्रशासनिक औपचारिकता की फाइलों को पीछे छोड़ते हुए डीएसपी मुख्यालय अभिषेक कुमार ने खुद मोर्चे पर उतरकर खाकी के असली मायने को परिभाषित कर दिया है।
जब मुस्तैदी बन जाती है जन- विश्वास का कवच:
जलस्तर बढ़ने और कटाव तेज होने की खबर मिलते ही स्थिति भयावह हो चुकी थी। ग्रामीण सहमे हुए थे, और पानी हर गुजरते पल के साथ दायरा बढ़ाता जा रहा था। ऐसे संकट के बीच डीएसपी मुख्यालय अभिषेक कुमार का जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव और वरीय पुलिस अधीक्षक रौशन कुमार के साथ मौके पर पहुंचना और बारिश तथा बाढ़ के बहाव की परवाह किए बिना सीधे पानी में उतर जाना, किसी चमत्कार से कम नहीं था। कंधे पर बांस लादे, खुद भींगते हुए जब एक उच्च पुलिस अधिकारी कटाव स्थल पर रेस्क्यू और मरम्मत कार्य में जुट गया, तो वहां खड़े आम नागरिकों का कलेजा मजबूत हो गया। यह दृश्य उन लोगों के लिए एक करारा जवाब था जो अक्सर प्रशासनिक अमले को केवल वातानुकूलित कमरों तक सीमित मानते हैं। एक वर्दीधारी अधिकारी को जब अपनी जान जोखिम में डालकर जनता के बीच खड़े देखा जाता है, तो कानून और व्यवस्था का यह खाका महकमे के प्रति आम आदमी के मन में सम्मान की एक नई लकीर खींच देता है।
वर्दी का असली फर्ज, सिर्फ हुक्म नहीं, बल्कि खुद आगे बढ़कर राह दिखाना:
संकट की इस घड़ी में डीएसपी मुख्यालय अभिषेक कुमार का यह कदम केवल एक राहत कार्य नहीं था, बल्कि यह पुलिसिंग का मानवीय चेहरा भी था। खाकी वर्दी का वजन सिर्फ उसके कंधों पर लगे स्टार्स या बैज से नहीं आंका जाता है, बल्कि उस जज्बे से तौला जाता है जो आपदा के समय जनता के साथ सीना तानकर खड़ा हो सके। जब नेतृत्व खुद आगे आकर पसीना और पानी बहाता है, तो मातहतों और स्थानीय युवाओं का हौसला स्वतः सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। त्रिलोकचक के लोगों के लिए वह दिन केवल एक प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि यह देखने का दिन था कि खाकी आज भी इंसानियत के पक्ष में सबसे मजबूत दीवार बनकर खड़ी हो सकती है।

