मुक्तांचल के स्वर्णिम 50वें अंक का लोकार्पण, कोलकाता की साहित्यिक विरासत पर हुआ गंभीर विमर्श
हावड़ा, 12 जुलाई 2026
विद्यार्थी मंच एवं मुक्तांचल के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को मुक्तांचल पत्रिका के स्वर्णिम 50वें विशेषांक 'कलकत्ता से कोलकाता' का लोकार्पण समारोह एवं साहित्यिक अड्डा का आयोजन हावड़ा में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, आलोचकों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, शोधार्थियों तथा युवा रचनाकारों ने कोलकाता की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत, हिंदी साहित्य की परंपरा और समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों पर गंभीर विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुक्तांचल की संपादक एवं विद्यार्थी मंच की अध्यक्ष डॉ. मीरा सिन्हा के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कहा कि विशेषांक 'कलकत्ता से कोलकाता' केवल एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि दो सदियों के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परिवर्तन का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने बताया कि इस अंक में शहर के इतिहास, साहित्य, संस्कृति, प्रमुख व्यक्तित्वों और उनके योगदान को व्यापक रूप से समाहित करने का प्रयास किया गया है।
प्रख्यात आलोचक डॉ. शंभुनाथ ने मुक्तांचल के पचास अंकों की सतत प्रकाशन यात्रा को हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएं समाज की वैचारिक चेतना को जीवित रखने का कार्य करती हैं तथा डिजिटल युग में संवाद और आत्मीयता बनाए रखने के लिए ऐसे आयोजनों की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
वरिष्ठ आलोचक डॉ. अमरनाथ ने कोलकाता की सांस्कृतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि समय के साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन आया है, लेकिन साहित्य आज भी समाज को दिशा देने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने मुक्तांचल को गंभीर, परिपक्व एवं संग्रहणीय पत्रिका बताते हुए डॉ. मीरा सिन्हा की संपादकीय दृष्टि की सराहना की।
डॉ. अमित कुमार ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना "कलकत्ता" होता है और यह शहर केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि संघर्ष, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक है। वहीं सुप्रसिद्ध कथाकार शर्मीला जालान ने कहा कि मुक्तांचल, भारतीय भाषा परिषद तथा अन्य साहित्यिक मंच समाज में सकारात्मक वैचारिक वातावरण तैयार कर रहे हैं, जहां साहित्य और संस्कृति पर गंभीर संवाद संभव हो पा रहा है।
विचार गोष्ठी में डॉ. पंकज साहा, महेश जायसवाल, मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. चित्रा माली, सुरेश शॉ, प्रकाश अग्रवाल, डॉ. विजया सिंह, जितेंद्र जितांशु, मीनाक्षी सांगनेरिया, विनय जायसवाल और दिव्या प्रसाद सहित अनेक वक्ताओं ने कोलकाता के साहित्यिक इतिहास, स्त्री विमर्श, रंगमंच, पत्रकारिता, सामाजिक परिवर्तन और हिंदी साहित्य की समकालीन चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।
साहित्यिक सत्र में वरिष्ठ ग़ज़लकार सेराज ख़ान बातिश ने अपनी नई ग़ज़लों का प्रभावशाली पाठ किया। विद्यार्थी मंच के सचिव विवेक लाल ने अरुण कमल की चर्चित कविता "जाऊँगा मैं जाऊँगा, कोलकाता जाऊँगा" का सस्वर पाठ किया। वहीं विद्यार्थियों रागिनी पांडेय, स्वराज पांडेय, सुकन्या तिवारी, राव्या श्रीवास्तव और रोहित शर्मा ने कविता-पाठ कर श्रोताओं की भरपूर सराहना प्राप्त की।
इस अवसर पर गाथा प्रकाशन से प्रकाशित चौथे तार सप्तक के वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज के नवीन कविता-संग्रह 'अंत नहीं, अंतिम नहीं, कुछ भी' का भी लोकार्पण किया गया। वक्ताओं ने इसे समकालीन हिंदी कविता में मानवीय संवेदना और जनपक्षधर चेतना का महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह बताया।
वरिष्ठ समाजसेवी रामनिवास द्विवेदी ने मुक्तांचल की निरंतर साहित्यिक यात्रा की सराहना करते हुए इसे हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय उपलब्धि बताया। कार्यक्रम का संचालन विनोद यादव ने किया, जबकि अंत में मुक्तांचल के प्रबंध संपादक सुशील कुमार पांडेय ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, विद्यार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, पत्रकार, रंगकर्मी एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
मुक्तांचल 50वां अंक, कलकत्ता से कोलकाता, विद्यार्थी मंच, डॉ मीरा सिन्हा, हावड़ा साहित्यिक कार्यक्रम, हिंदी साहित्य, कोलकाता साहित्य, साहित्यिक अड्डा, राजकुमार कुंभज, सेराज खान बातिश

