13 साल बाद भी गंडामन के जख्म नहीं भरे: 23 मासूमों की याद में आज भी नम हो जाती हैं आंखें, अधूरे वादे और शिक्षा व्यवस्था पर कायम सवाल
गांव की शिक्षा व्यवस्था मजबूत होती, तो गंडामन गांव की पहचान केवल एक त्रासदी तक सीमित नहीं रहती; ग्रामीण
✍️ संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी
छपरा, 16 जुलाई 2026
बिहार ही नहीं, पूरे देश को झकझोर देने वाली गंडामन मिड डे मील त्रासदी की आज 13वीं बरसी है। 16 जुलाई 2013 को सारण जिले के मशरक प्रखंड अंतर्गत धर्मासती गंडामन गांव स्थित नवसृजित प्राथमिक विद्यालय में मध्यान्ह भोजन (मिड डे मील) खाने के बाद विषाक्त भोजन के कारण 23 मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य बच्चे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था और विद्यालयों में संचालित मध्यान्ह भोजन योजना की गुणवत्ता, निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। तेरह वर्ष गुजर जाने के बावजूद उस भयावह दिन की याद आज भी पीड़ित परिवारों और गांव के लोगों के दिलों में ताजा है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि इस हादसे ने कई परिवारों की दुनिया हमेशा के लिए उजाड़ दी। कई घरों में एक साथ दो- दो बच्चों की मौत हुई थी। उन परिवारों के लिए 16 जुलाई आज भी ऐसा दिन है, जिसे याद करते ही आंखें भर आती हैं। पीड़ित अभिभावकों का कहना है कि वह आज भी उस विद्यालय की ओर देखने का साहस नहीं जुटा पाते, क्योंकि वहां की हर दीवार उन्हें अपने बच्चों की याद दिलाती है।
अधूरे विकास कार्यों और पूरे न हो सके वादों की चर्चा एक बार फिर होगी शुरू;
हादसे में अपनी बेटी बेबी कुमारी को खो चुके पीड़ित पिता शंकर ठाकुर बताते हैं कि आज भी 16 जुलाई का दिन गंडामन गांव में मातम और स्मरण का दिन बन कर आता है। हादसे में जान गंवाने वाले 23 मासूम बच्चों की याद में बने स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। गांव के लोग, प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि दिवंगत बच्चों को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे। लेकिन श्रद्धांजलि के साथ- साथ हर वर्ष अधूरे विकास कार्यों और पूरे न हो सके वादों की चर्चा भी फिर से शुरू हो जाती है। घटना के बाद राज्य सरकार ने दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की थी और भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो, इसके लिए कई महत्वपूर्ण दिशा- निर्देश और गाइड लाइन जारी किया गया था। विद्यालयों में भोजन की गुणवत्ता की जांच, खाद्य सामग्री के सुरक्षित भंडारण, भोजन परोसने से पहले उसके परीक्षण (टेस्टिंग), रसोईघर की नियमित निगरानी तथा स्वच्छता संबंधी मानकों को अनिवार्य किया गया। इसके बावजूद यह हादसा आज भी प्रशासन और शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी सीख के रूप में याद किया जाता है।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पर्याप्त शैक्षणिक सुविधाओं का घोर अभाव;
अखिलानंद मिश्रा ने बताया कि सरकार ने उस समय गंडामन गांव को गोद लेने की घोषणा की थी। जिस विद्यालय में यह दर्दनाक घटना हुई थी, उसका नया भवन बनाकर उसे उच्चीकृत किया गया। दिवंगत बच्चों की स्मृति में करोड़ों रुपए की लागत से स्मारक बनाया गया, इंटर कॉलेज की स्थापना हुई, स्वास्थ्य उप केंद्र और जलमीनार का निर्माण कराया गया तथा कई सड़कों का निर्माण भी शुरू हुआ। गांव में बिजली की व्यवस्था, अधिकांश परिवारों को पक्के आवास, पेंशन योजना और तालाब के उन्नयन सहित कई विकास योजनाओं को जमीन पर उतारा गया। हालांकि विकास के कई वादे आज भी अधूरे हैं। गांव की सभी सड़कें पूरी तरह नहीं बन सकीं और सबसे बड़ी चिंता शिक्षा व्यवस्था को लेकर है। उनका कहना है कि जिस गांव ने इतनी बड़ी त्रासदी झेली, वहां आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पर्याप्त शैक्षणिक सुविधाओं का अभाव है।
दिवंगत बच्चों की स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम किया जाएगा आयोजित; जिलाधिकारी
सारण के जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव ने कहा कि गंडामन जैसी घटना की पुनरावृत्ति रोकना जिला प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि सभी विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों, शिक्षकों और रसोइयों को समय-समय पर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। रसोईघर में अनधिकृत व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक, खाद्य सामग्री की नियमित जांच, स्वच्छ भंडारण तथा भोजन परोसने से पहले उसका परीक्षण सुनिश्चित करने के निर्देश सख्ती से लागू किए गए हैं। उन्होंने बताया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी जिला प्रशासन द्वारा दिवंगत बच्चों की स्मृति में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।
तेरह वर्ष बाद भी गंडामन मिड डे मील त्रासदी केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की निरंतर याद दिलाने वाली घटना है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सच्ची श्रद्धांजलि केवल स्मारक पर पुष्प अर्पित करने से नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने से होगी कि बिहार के किसी भी विद्यालय में किसी बच्चे की जान लापरवाही के कारण न जाए। जब तक हर विद्यालय में सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और पारदर्शी मध्यान्ह भोजन व्यवस्था तथा बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं सुनिश्चित नहीं होतीं, तब तक गंडामन के इन 23 मासूमों का दर्द समाज और व्यवस्था दोनों के सामने एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर खड़ा रहेगा।

