आहिस्ता-आहिस्ता मैं पत्रकारिता को विदा कर रहा था...
/// जगत दर्शन न्यूज
प्रिय पत्रकार मित्र,
कभी-कभी जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब शब्द साथ छोड़ देते हैं। मन में भावनाओं का अथाह समुद्र उमड़ रहा होता है, लेकिन उन्हें व्यक्त करने के लिए कोई भाषा पर्याप्त नहीं लगती। ऐसे समय में मौन बोलता है। वह मौन, जिसमें हजारों प्रश्न होते हैं, लाखों स्मृतियाँ होती हैं और अनगिनत अनकहे संवाद छिपे होते हैं। किंतु विडंबना देखिए, जिन लोगों ने पूरी उम्र शब्दों को साधने का दावा किया, वे भी उस मौन की भाषा को नहीं पढ़ पाए।
मैं भी कभी यही सोचता था कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं है। यह एक साधना है, एक तपस्या है, एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलने वाला व्यक्ति अपने सुख-दुख, अपने लाभ-हानि और अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को पीछे छोड़ देता है। वह समाज के लिए जीता है, सत्य के लिए संघर्ष करता है और जनहित को अपना धर्म मानता है। लेकिन समय के साथ समझ में आया कि पत्रकारिता के मंदिर में भी अब श्रद्धा कम और स्वार्थ अधिक दिखाई देने लगा है।
एक समय था जब पत्रकारिता मेरे लिए प्रेम थी। ऐसा प्रेम जिसमें कोई अपेक्षा नहीं थी। मैं घंटों सड़कों पर घूमता था, लोगों की समस्याएँ सुनता था, उनकी पीड़ा को अपने शब्दों में ढालने का प्रयास करता था। किसी गरीब की आवाज़ बन जाना, किसी अन्याय के खिलाफ खड़े हो जाना, किसी उपेक्षित व्यक्ति की कहानी को समाज तक पहुँचाना—यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होती थी। उस समय न पद की चिंता थी, न प्रतिष्ठा की, न धन की।
लेकिन धीरे-धीरे मैंने देखा कि जिन मूल्यों के लिए पत्रकारिता जानी जाती थी, वे धूमिल होने लगे। सत्य के स्थान पर सुविधा आने लगी। संघर्ष के स्थान पर समझौते होने लगे। प्रश्न पूछने वालों की संख्या कम होने लगी और प्रशंसा करने वालों की संख्या बढ़ने लगी। पत्रकारिता का वह चेहरा, जिससे मैं प्रेम करता था, धीरे-धीरे मेरी आँखों के सामने बदल रहा था।
सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर दिखाई देता है। जब वही लोग, जिनके साथ कभी पत्रकारिता के आदर्शों की चर्चा होती थी, अवसरों के अनुसार अपने सिद्धांत बदलने लगते हैं। जब मित्रता का आधार विचार नहीं, बल्कि लाभ हो जाता है। जब कलम की धार को सत्य नहीं, बल्कि संबंधों और समीकरणों के अनुसार मोड़ा जाने लगता है।
ऐसे समय में व्यक्ति किसी और से नहीं, स्वयं से लड़ता है। वह अपने भीतर बसे उस पत्रकार को बचाने की कोशिश करता है जो अब भी आदर्शों पर विश्वास करता है। लेकिन हर संघर्ष की एक सीमा होती है। जब लगातार समझौते, उपेक्षाएँ और निराशाएँ सामने आती हैं, तब मन थकने लगता है।
मुझे आज भी ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता कोई निर्जीव व्यवस्था नहीं, बल्कि एक जीवंत व्यक्तित्व थी। वह मेरे जीवन की साथी थी। उसने मुझे पहचान दी, सम्मान दिया, संघर्ष दिए और अनुभव दिए। मैंने उसके साथ हँसना सीखा, रोना सीखा और जीवन को समझना सीखा। लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह मुझसे दूर जा रही है।
मैं उसे रोकना भी नहीं चाहता। क्योंकि प्रेम का अर्थ बंधन नहीं होता। जो जाना चाहता है, उसे रोकने का प्रयास केवल पीड़ा को बढ़ाता है। इसलिए मैं दूर खड़े होकर उसे जाते हुए देख रहा हूँ। मेरी आँखें नम हैं, लेकिन होंठों पर मुस्कान है। शायद इसलिए नहीं कि मैं प्रसन्न हूँ, बल्कि इसलिए कि विदाई को भी गरिमा के साथ स्वीकार करना चाहिए।
आँगन में खड़ा वह गुलमोहर आज भी गवाह है उन अनगिनत सपनों का जो मैंने पत्रकारिता के साथ देखे थे। उसकी छाया में बैठकर मैंने अनेक लेख लिखे, अनेक योजनाएँ बनाई और अनेक संघर्षों की रणनीति तैयार की। आज उसी गुलमोहर के पीछे खड़ा होकर मैं अपनी भावनाओं को छिपाने का प्रयास कर रहा हूँ।
मैं अपने हृदय को समझाता हूँ कि अब शांत हो जाओ। अब शिकायतों का कोई अर्थ नहीं। जिन स्मृतियों को बचाया नहीं जा सकता, उन्हें सम्मानपूर्वक विदा कर देना चाहिए। धड़कनों से कहता हूँ कि थोड़ा कम शोर करो। आँखों से कहता हूँ कि अब आँसुओं को लौट जाने दो। क्योंकि कुछ विदाइयाँ ऐसी होती हैं जिन्हें शब्दों से नहीं, केवल मौन से स्वीकार किया जाता है।
शायद यही जीवन का नियम भी है। जो चीज़ें हमें सबसे अधिक प्रिय होती हैं, कभी-कभी वही हमसे सबसे अधिक दूर चली जाती हैं। लेकिन उनका जाना भी व्यर्थ नहीं होता। वे हमें कुछ सिखाकर जाती हैं। पत्रकारिता ने भी मुझे बहुत कुछ सिखाया है। उसने सिखाया कि सत्य की राह कठिन होती है। उसने सिखाया कि सम्मान माँगा नहीं जाता, अर्जित किया जाता है। उसने सिखाया कि यदि पूरी दुनिया आपके खिलाफ खड़ी हो जाए, तब भी सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
आज भले ही मैं पत्रकारिता को विदा करने की बात कर रहा हूँ, लेकिन सच यह है कि पत्रकारिता केवल संस्थानों, पदों या परिचय पत्रों में नहीं बसती। वह एक विचार है। वह एक चेतना है। यदि वह भीतर जीवित है, तो कोई उसे समाप्त नहीं कर सकता।
इसलिए यह विदाई शायद पत्रकारिता से नहीं, बल्कि उन भ्रमों से है जिन्हें मैंने वर्षों तक सत्य समझ लिया था। यह विदाई उन अपेक्षाओं से है जो मैंने लोगों से की थीं। यह विदाई उन संबंधों से है जो समय के साथ अपना अर्थ खो बैठे।
किन्तु पत्रकारिता के प्रति मेरा प्रेम आज भी वैसा ही है। यदि कभी भविष्य में वह फिर उसी स्वरूप में लौटे, जिसमें सत्य सर्वोपरि हो, जिसमें कलम सत्ता से नहीं, समाज से जुड़ी हो, जिसमें पत्रकारिता व्यवसाय नहीं बल्कि जनसेवा का माध्यम बने तो शायद मैं फिर उसी आँगन में उसका स्वागत करने के लिए खड़ा मिलूँगा।
फिलहाल तो मैं बस इतना ही कह सकता हूँ वो पत्रकार मित्र आहिस्ता-आहिस्ता धूमिल कर रहा था मेरे ज़हन में बसी पत्रकारिता की स्मृतियाँ, और मैं गीले नयनों पर मुस्कुराहट का मुखौटा ओढ़े, आहिस्ता-आहिस्ता पत्रकारिता को विदा कर रहा था। क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ समाप्त नहीं होतीं, वे केवल स्मृतियों में बदल जाती हैं।

