कोलकाता की मशहूर 'नाखोदा मस्जिद':
सिर्फ एक इबादतगाह नहीं, बल्कि इतिहास, वास्तुकला और विरासत का जीता-जागता सबूत
/// जगत दर्शन न्यूज
✍️धर्मेंद्र रस्तोगी
वर्ष 1926 में बनी यह मस्जिद शहर की सबसे बड़ी और प्रमुख मस्जिदों में गिनी जाती है। जिसमे 10 हजार से ज्यादा नमाजी एक साथ नमाज पढ़ सकते हैं, इसकी भव्य बनावट, ऊँची मीनारें और मुगल शैली इसे और खास बनाती हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि “नाखोदा” शब्द का संबंध समुद्री नाविक या जहाज़ के कप्तान से बताया जाता है। यानी इसके नाम में भी समुद्री व्यापार, यात्रा और इतिहास की एक परत छिपी है। यह उस दौर की याद दिलाता है जब कोलकाता व्यापार और संस्कृति का बड़ा केंद्र था। आज भी नाखुदा मस्जिद सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कोलकाता की पहचान, विरासत और साझा इतिहास की निशानी है। इसकी दीवारें और गुंबद सिर्फ इमारत नहीं, बल्कि एक समय की कहानी सुनाते हैं।
अब पढ़िए इसके कुछ और दिलचस्प फैक्ट्स:
नाखोदा मस्जिद का निर्माण कच्छ के रहने वाले व्यापारी और परोपकारी अब्दुर रहीम उस्मान ने कराया था। इस मस्जिद की वास्तुकला में मुगल, इस्लामिक और इंडो-सरैसेनिक शैली की झलक मिलती है। इसकी बनावट को कई लोग अकबर के मकबरे से प्रेरित मानते हैं। मस्जिद के मुख्य ढांचे में 3 बड़े गुंबद और 2 ऊँची मीनारें हैं। कुछ स्रोतों के अनुसार इसकी मीनारें लगभग 151 फीट ऊँची हैं। इसके निर्माण पर लगभग 15 लाख रुपये खर्च हुए थे, जो उस दौर में बहुत बड़ी रकम थी।
यह मस्जिद ज़करिया स्ट्रीट और रवींद्र सरणी के पास, कोलकाता के पुराने व्यापारिक इलाके में स्थित है।
इसे कोलकाता की प्रमुख जामा मस्जिद भी माना जाता है। मस्जिद के अंदर और बाहर की नक्काशी इसे सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक वास्तु-शिल्प कृति बनाती है। यह कोलकाता के उन ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है, जिन्हें देखने के लिए स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि बाहर से आए लोग भी रुचि दिखाते हैं।

