असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत
स्कूल की पुस्तकालय में यूँ ही बैठा किताबों से सजी अलमारी को निहार रहा था। तभी एक उपन्यास के शीर्षक ने अचानक ध्यान खींच लिया— उपन्यास का नाम था आईएएस फेल। नाम थोड़ा अटपटा लगा, और शायद यही अटपटापन मुझे उसकी ओर खींच ले गया। मैंने अलमारी की पहली कतार से किताब निकाली और पन्ने पलटने लगा। श्वेत कुमार सिन्हा की इस रचना की भूमिका ने शुरुआत में ही मन मोह लिया। कम शब्दों में इतनी गहरी और प्रभावशाली बात कहना सचमुच अद्भुत लगा। आज के युवाओं के लिए यह भूमिका एक प्रेरणा जैसी है। आइए, पढ़ते हैं उपन्यास की मूल भूमिका—
"हार अपने साथ जीत की उम्मीद लेकर आती है। बस जरूरत है, उसे पहचानने वाली नजरों की। दरअसल, सही मायने में देखा जाए तो हार हारने वाले के सब्र की दुःसाध्य परीक्षा लेता है। लेकिन दुःख की बात तो यह है कि तीस सेकंड की टॉलरेंस कैपेसिटी वाले वर्तमान रील युग में हर हाल में सफलता प्राप्त कर लेने की बात युवावर्ग के कच्चे मगज में इस कदर कूट-कूटकर भर दी गई है कि असफलता को वे अपने जीवन का डेड एंड मान लेने की भूल कर बैठते हैं। जबकि सच इससे बिल्कुल जुदा है। असलियत तो यह है कि हार चाहे कितनी भी बड़ी हो, अगर संयम से काम लिया जाए तो यह आने वाली जीत की पहली सीढ़ी साबित होती है और कई मौकों पर तो इसमें आकाश की बुलंदियों को छूने जितना माद्दा होता है। हार-जीत के इसी फलसफे पर आईएसएस फेल उपन्यास लिखी गयी है।"
उपन्यास 'आईएएस फेल' के परिप्रेक्ष्य में यह कथन एकदम सटीक बैठता है, जहाँ कहानी की शुरुआत ही हार से होती है। उपन्यास अपने कथानक और परिस्थितियों को माध्यम बनाकर अपनी समूची कहानी बयाँ करता है। कहानी गढ़ते वक्त सभी आयुवर्ग, खासकर युवाओं का खास खयाल रखते हुए जहाँ तक हो सके, इसके कहने का अंदाज को रोचक तरीके से परोसा गया है। ड्रैमेटिक हिंदी-शैली का प्रयोग करते हुए क्षेत्रीय भाषाओं को माध्यम बनाकर तथा भावनाओं के रंग-बिरंगे धागों में हास्य एवं व्यंग्यरूपी मनकों को पिरोकर छुए-अनछुए लहजे में कहानी कही गयी है। उपन्यास का निचोड़ यह है कि - "असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मविश्वास की नई शुरुआत होती है।


