हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष : राष्ट्रीय संगोष्ठी में डिजिटल चुनौतियों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर मंथन
कोलकाता (पश्चिम बंगाल): शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा पर आयोजित राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी में देशभर के साहित्यकारों, पत्रकारों, शोधार्थियों और शिक्षाविदों ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, डिजिटल मीडिया की चुनौतियों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर चर्चा की। “हिंदी पत्रकारिता : द्विशताब्दी की यात्रा, चुनौतियाँ और भविष्य” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में वक्ताओं ने हिंदी पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन और वैचारिक चेतना का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
कार्यक्रम की शुरुआत शब्दभूमि प्रकाशन के परिचय से हुई, जिसमें संस्था को साहित्य के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के लिए समर्पित सहकारी साहित्यिक मंच बताया गया। संगोष्ठी का संचालन कर रहीं गायत्री ने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की वैचारिक दिशा तय करने वाला बौद्धिक उपकरण है। उन्होंने ‘उदंत मार्तंड’ से लेकर डिजिटल मीडिया तक हिंदी पत्रकारिता की यात्रा का उल्लेख करते हुए कॉपी-पेस्ट संस्कृति, भाषाई प्रदूषण और एल्गोरिद्मिक नियंत्रण जैसी नई चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की।
दरभंगा के आशीष अम्बर ने हिंदी पत्रकारिता में नवाचार और तकनीकी बदलावों की चर्चा करते हुए कहा कि नई तकनीकें पत्रकारिता को अधिक लोकतांत्रिक बना रही हैं। तमिलनाडु की डॉ. बी. मल्लिका ने हिंदी पत्रकारिता को जनजागरण और सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बताया। वहीं मुंबई की शोभा नागप्पा माली ने प्रिंट मीडिया से डिजिटल मीडिया में हो रहे संक्रमण और फेक न्यूज़ के बढ़ते खतरे पर विस्तार से विचार रखे।
बिहार के डॉ. श्वेत प्रकाश ने ‘पोस्ट-ट्रुथ’ और ट्रोल संस्कृति को लोकतांत्रिक विमर्श के लिए गंभीर चुनौती बताया। महाराष्ट्र के राहुल भीवा हतागले ने समाज सुधार और जनजागरण में हिंदी पत्रकारिता की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित किया। भोपाल की डॉ. कमलिनी पशीने ने हिंदी पत्रकारिता की 200 वर्षों की यात्रा में भाषा, विचार और वैचारिक विकास का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया।
झारखंड के संजय प्रियंवद ने सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता की विश्वसनीयता को सबसे बड़ी चुनौती बताया। प्रो. निलोफर राशिद शेख ने पत्रकारिता में नैतिकता और मूल्यबोध की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि शांति सोनी ने स्त्री दृष्टि और संवेदनशील पत्रकारिता के महत्व को सामने रखा। मुकेश राम ने ग्रामीण समाज और जनपक्षधर पत्रकारिता के मुद्दों को केंद्र में रखने की जरूरत बताई। रूपा कुमारी ने नई पीढ़ी, डिजिटल अभिव्यक्ति और भाषा संकट पर अपने विचार साझा किए।
संगोष्ठी के दौरान कुछ अज्ञात लोगों द्वारा ऑनलाइन व्यवधान और अभद्र टिप्पणियाँ किए जाने की घटना भी सामने आई, जिसे आयोजकों ने सुनियोजित डिजिटल हमला बताया। हालांकि इसके बावजूद कार्यक्रम निर्बाध रूप से जारी रहा और वक्ताओं ने हिंदी पत्रकारिता को लोकतांत्रिक चेतना, सामाजिक बदलाव और वैचारिक प्रतिरोध का सशक्त माध्यम बताया।
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