गंगा
करते रहे हम साधना,नित अर्चना सरि गंग की।
भजते रहे शुभ नाम को, मुनि साधु के शुभ संग की।।
मनभावना भव भक्ति से, शुचि सत्य की नित साधना।
बहती रहे नित धार ये, हर भक्त की यह कामना।।
हर घाट पे नर नारियाॅं, करते दिखे नित वंदना।
सलिला तरंगित हो सदा,करते रहें अभिनंदना।।
भव तारिणी भय हारिणी, सरि पावनी बहती रहे।
दुख नाशिनी मधु मालिनी, धन धान्य से भरती रहे ।।
जल धार ये त्रय -लोक्य को,नित मातृ सी वह पालती।
मन भक्ति दे परिपूर्णता, जग भार से वह तारती।।
यश- कीर्ति की वह दायिनी, करते सदा शुभ आरती।
नित सींचती तरु वृक्ष को, जय हो सदा नव भारती।।
शिव की जटा शुभ शोभिता, जगतारिणी अघ नाशिनी।
रमता रहे मन गंग में, सद वंश की तुम स्वामिनी।
गुण ध्यान की उर चाहना,दृग चाहतें नित दर्श को।
बरसे कृपा जो गंग की,यश चूमता तब अर्श को।।


