क्रांतिकारी लेखक "रवीन्द्रनाथ टैगोर"
✍️ प्रिया श्रीवास्तव
एक ऐसा व्यक्तित्व जो साहित्य जगत के लिए वरदान साबित हुआ। हम बात कर रहे हैं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की। जिनका जन्म भारत के कलकत्ता में 7 मई 1861 को देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के पुत्र के रूप हुआ में हुआ था। वो अपने माता पिता के चौदहवे संतान थे।
एक समृद्ध और शिक्षित ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद भी उनका मन पढ़ाई में बिलकुल भी नहीं लगता था। पिता की इच्छा थी कि वो वकील बनें। उनका मन पढ़ाई में बिलकुल नहीं लगता था इसलिए कितने ही स्कूल बदले गए, बाद में उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने घर पर निजी शिक्षकों के माध्यम से प्राप्त की और कभी स्कूल नहीं गये, हालांकि कानून की पढ़ाई करने के लिये 1878 ई. में वो इंग्लैंड गये थे लेकिन बिना पढ़ाई को पूरा किये वापस भारत लौट आये। क्योंकि उन्हें एक कवि और लेखक के रुप में आगे बढ़ना था।
टैगोर जी का पूरा नाम 'रविन्द्र नाथ ठाकुर' था। ठाकुर परिवार उस समय के सबसे अमीर परिवारों में से एक था। अंग्रेजों को "ठाकुर" उच्चारण करने में कठिनाई होती थी इसलिए वो "टैगोर" कहते थे और फिर ठाकुर परिवार "टैगोर" कहलाने लगा।
टैगोर जी के जीवन में प्रेम, राष्ट्रप्रेम, धर्म, परिवार, विवाह, समाज और अध्ययन का समान मिश्रण था। उन्होंने हर किरदार को ईमानदारी से निभाया।
8 वर्ष की उम्र से ही कविता लिखने वाले टैगोर जी की कविताएँ स्यूडोनिम भानुसिंहों के तहत केवल 16 वर्ष की उम्र से ही प्रकाशित होने लगी थीं।
इंग्लैंड से लंबी समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने अपने कार्य गीतांजलि को अंग्रेजी में अनुवादित किया। जिस वर्ष गीतांजलि का प्रकाशन हुआ था उसी वर्ष उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अपने लेखन में उन्होंने भारतीय संस्कृति की रहस्यवाद, और भावनात्मक सुंदरता को दिखाया जिसके लिये पहली बार किसी गैर-पश्चिमी व्यक्ति को इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाज़ा गया। जलिया वाला बाग हत्याकांड के बाद उन्होंने ये उपाधि लौटा दी थी।
एक प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही साथ, वो एक प्रतिभाशाली लेखक, उपन्यासकार, संगीतकार, नाटक लेखक, चित्रकार और दर्शनशास्त्री थे। कविता और कहानी लिखने के दौरान कैसे भाषा पर नियंत्रण रखना है ये उन्हें खूब पता था। वो एक अच्छे दर्शनशास्त्री थे जिसके माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भारतीय लोगों की बड़ी संख्या को उन्होंने अपने क्रांतिकारी लेखन से प्रभावित किया।
भारतीय साहित्य के लिये उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनके रवीन्द्रसंगीत में दो गीत बहुत प्रसिद्ध हुए क्योंकि वो दो देशों के राष्ट्रगान हैं “जन मन गण” (भारत का राष्ट्रगान) और “आमार सोनार बांग्ला” (बांग्लादेश का राष्ट्रगान)।
"जन गण मन" को जब राष्ट्रगान बनाया तब उनपर कई तरह के आरोप लगे उन्हें अंग्रेजों का चाटुकार कहा गया, क्यों की उसमें लिखे "भारत भाग्य विधाता" को अंग्रेजो के लिए समझा गया था, बाद में उन्होंने एक पत्र में ये साफ किया कि "कोई किसी का भाग्य विधाता नहीं होता ये लाइन ईश्वर के लिए है अंग्रेजों में इतनी क्षमता नहीं ही की वो भारत का भाग्य बना सकें।"
उनकी रचनात्मक लेखन, चाहे वो कविता हो या कहानी कोई आज भी उसे चुनौती नहीं दे सकता। शायद वो पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने असरदार लेखन से पूरब और पश्चिम के बीच की दूरी को कम कर दिया।
आजादी के समय क्रांतिकारी कविताएं लिखकर उन्होंने भारतवासियों के मन में जो क्रांति की ज्वाला जलाई वो वो गीत बनकर हर विद्यालय की शोभा बढ़ा रहा है।
जैसे
"हम होंगे कामयाब एक दिन...", "मन जहां डर से परे है और सिर जहां ऊंचा है......
ओ पिता परमेश्वर
मेरे देश को जागृत बनाओ”
और भी कई कविताएं जिसमें उन्होंने सिर्फ बिना डरे लड़ना और जीत जाने कि प्रेरणा दी।
वो ईश्वर से रक्षा की भीख नहीं मांगते वो शक्ति मांगते हैं जिससे जीतने का हौसला मिले। वो अकेले चलने कि बात करते है उन्हें जुलूस से कोई उम्मीद नहीं है।
"अनसुनी करके तेरी बात
न दे जो कोई तेरा साथ
तो तुही कसकर अपनी कमर
अकेला बढ़ चल आगे रे–
अरे ओ पथिक अभागे रे।"
वो भीड़ हट कर चलने की बात करते है सच के लिए लड़ने कि बात करते हैं।
उनका एक गीत... "चल अकेला...."। उन्होंने ऐसी कई कविताएं लिखीं जिसे गाने भर से इंसान शक्ति से भर जाता है।
ईश्वर में अथाह विश्वास करने वाले टैगोर ने हमें बिना कुछ मांगे बहुत कुछ दिया जिसका कर्ज हम शायद कभी चुका नहीं पाए।
वो धार्मिक और आध्यात्मिक पुरुष थे जिन्होंने मुश्किल वक्त़ में दूसरों की बहुत मदद की। उन्होंने जब शांतिनिकेन नाम की एक अनोखी यूनिवर्सिटी की स्थापना की तब उन्हें वृद्धा अवस्था में काम करना पड़ा था ये बाते गांधी जी को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने यूनिवर्सिटी के लिए 50000 रुपए की व्यवस्था करवाई थी। उन्हें गांधी जी, राजेन्द्र प्रसाद के साथ कई अन्य नेताओं का स्नेह भी पर्याप्त मात्रा में मिलता रहा।
भारत की स्वतंत्रता के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाले टैगोर आजादी को देखे बिना ही 7 अगस्त 1941 को दुनिया छोड़कर राख हो गए लेकिन उनके लिखे स्वर्णिम अक्षरों में वे सदा हमारे बीच रहेंगे।
भट्टो नगर, लिलुआ
पश्चिम बंगाल
संपर्क: 8820726144


