रामायण के हनुमान: वाल्मीकि और तुलसी परंपरा में एक तुलनात्मक अध्ययन
(लेखक युवा शिक्षाविद् एवं पश्चिम बंगाल शिक्षा विभाग में कार्यरत)
भारतीय साहित्यिक परंपरा में हनुमान का चरित्र केवल एक पौराणिक व्यक्तित्व नहीं बल्कि सांस्कृतिक आदर्शों, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना का समन्वित प्रतिरूप है। वाल्मीकि रामायण तथा रामचरितमानस इन दोनों महाकाव्यों में हनुमान का चित्रण भिन्न भिन्न वैचारिक धरातलों पर हुआ है। वाल्मीकि रामायण में जहाँ हनुमान कर्मयोग, नीति और बुद्धि के प्रतिनिधि हैं, वहीं तुलसीदास के मानस में वे दास्य-भक्ति, समर्पण और आध्यात्मिक उत्कर्ष के प्रतीक बन जाते हैं। यह द्वैत वस्तुतः भारतीय चिंतन की व्यापकता का द्योतक है, जहाँ एक ही चरित्र में कर्म और भक्ति, शास्त्र और लोक, तर्क और आस्था का अद्भुत समन्वय संभव है।
बौद्धिकता और वाक्पटुता के संदर्भ में देखें तो महर्षि वाल्मीकि की दृष्टि में हनुमान का प्रथम परिचय ही उनकी असाधारण वाक्पटुता और शास्त्रीय ज्ञान के माध्यम से होता है। राम उनके संवाद को सुन कर आश्चर्यचकित होते हुए कहते हैं—
नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम्॥
उपरोक्त कथन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि हनुमान केवल शारीरिक बल के प्रतीक नहीं, बल्कि वेद-वेदांगों में पारंगत एक विद्वान भी हैं।
यही बौद्धिकता उन्हें एक आदर्श राजदूत और कूटनीतिज्ञ बनाती है। वे परिस्थितियों के अनुसार भाषा और व्यवहार का चयन करते हैं। सीता के समक्ष कोमल, रावण के समक्ष दृढ़ और विभीषण के प्रति सहानुभूतिपूर्ण। इस प्रकार वाल्मीकि के हनुमान एक “कर्मयोगी-विद्वान” (Intellectual Hero) के रूप में उभरते हैं जो भारतीय नीतिशास्त्र की परंपरा को मूर्त रूप देते हैं।
रामचरितमानस में हनुमान का चरित्र पूर्णतः भक्ति-केंद्रित है। तुलसीदास उन्हें ईश्वर-समर्पण की चरम अभिव्यक्ति के रूप में चित्रित करते हैं—
“रामदूत अतुलित बल धामा
अंजनी पुत्र पवन सुत नामा।”
हनुमान का प्रत्येक कार्य ‘अहं-शून्यता’ (Egolessness) का उदाहरण है। लंका-दहन जैसे महाकर्म के पश्चात वे कहते हैं—
“नाथ न कछु मोरि प्रभुताई।”
यहाँ तुलसीदास भक्ति-दर्शन के उस सिद्धांत को स्थापित करते हैं जिसमें ‘कर्तृत्व’ का पूर्ण विसर्जन ईश्वर में कर दिया जाता है। हनुमान इस दृष्टि से ‘निष्काम भक्ति’ (Selfless Devotion) के सर्वोच्च प्रतिमान बन जाते हैं।
वाल्मीकि और तुलसी की परंपराओं में हनुमान का स्वरूप क्रमशः कर्मयोग और भक्तियोग के द्वैत को उद्घाटित करता है। वाल्मीकि के हनुमान अपने कर्म के माध्यम से धर्म की स्थापना करते हैं जबकि तुलसी के हनुमान भक्ति के माध्यम से आत्मोत्कर्ष की ओर अग्रसर होते हैं। यह द्वैत वस्तुतः भारतीय दर्शन के गीता-प्रदत्त कर्मयोग और भक्तियोग सिद्धांत
का ही साहित्यिक रूपांतरण है। हनुमान इन दोनों के मध्य सेतु का कार्य करते हैं, जहाँ कर्म और भक्ति परस्पर विरोधी न होकर पूरक बन जाते हैं।
वाल्मीकि रामायण में हनुमान की वीरता यथार्थ परक है। वे अपनी सीमाओं और क्षमताओं का आकलन करते हुए कार्य करते हैं। समुद्र-लांघन से पूर्व उनका आत्म-संशय और तत्पश्चात आत्मविश्वास इसी यथार्थता को दर्शाता है। तुलसीदास के यहाँ यह वीरता अलौकिक बन जाती है—
“कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुण्डल कुंचित केशा।”
अर्थात हनुमान एक दिव्य शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं जो भक्त-हृदय में श्रद्धा और आस्था का संचार करते हैं।
हनुमान का दूत-रूप वाल्मीकि रामायण में अत्यंत व्यावहारिक और नीतिपरक है। वे रावण को धर्म का उपदेश देते हुए भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते। तुलसीदास इस दूतत्व को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान करते हैं—
“प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं
जलधि लाधि गये अचरज नाही़।” यहाँ दूतत्व केवल राजनयिक कर्तव्य नहीं, बल्कि भक्ति का विस्तार बन जाता है।
वाल्मीकि कृत रामायण की संस्कृत भाषा शास्त्रीयता, औपचारिकता और तर्कप्रधानता से युक्त है, जिससे हनुमान का चरित्र एक ‘महाकाव्यीय नायक’ के रूप में उभरता है। वहीं
तुलसी की अवधी भाषा लोक-सरलता और भावात्मकता से परिपूर्ण है, जिससे हनुमान जन-जन के प्रिय बन जाते हैं। अतः यही अंतर दोनों परंपराओं की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को भी स्पष्ट करता है।
वाल्मीकि के हनुमान में आत्मविश्वास है, परंतु अहंकार नहीं।
तुलसीदास इस विनम्रता को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान करते हैं—
“सब पर राम तपस्वी राजा
तिनके काज सकल तुम साजा।” यहाँ हनुमान की शक्ति पूर्णतः राम के अधीन है जो उन्हें आदर्श सेवक बनाती है।
वाल्मीकि के यहाँ हनुमान का आध्यात्मिक पक्ष अप्रत्यक्ष है जबकि तुलसीदास उन्हें भक्तियोग का सर्वोच्च साधक बना देते हैं—
“प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।”
यहाँ हनुमान ईश्वर-प्रेम की पराकाष्ठा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वाल्मीकि का हनुमान शास्त्रीय परंपरा का प्रतिनिधि है जबकि तुलसी का हनुमान लोकजीवन में रचे-बसे हैं। अर्थात दोनों मिलकर भारतीय सांस्कृतिक चेतना में हनुमान के समग्र स्वरूप का निर्माण करते हैं।
वस्तुत: कहा जा सकता है कि हनुमान का चरित्र भारतीय साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा में एक अद्वितीय समन्वय का प्रतिमान है। वाल्मीकि रामायण में वे एक कर्मयोगी, नीतिज्ञ और बुद्धिमान योद्धा के रूप में उभरते हैं जबकि रामचरितमानस में उनका स्वरूप दास्य-भक्ति, विनम्रता और ईश्वर-समर्पण का चरम रूप ग्रहण करता है। हनुमान का चरित्र स्थिर नहीं बल्कि गतिशील और बहुआयामी है जो विभिन्न युगों और संदर्भों में नए अर्थ ग्रहण करता है। अतः हनुमान केवल एक पौराणिक पात्र नहीं अपितु भारतीय जीवन दर्शन के जीवंत प्रतीक हैं जो आज भी मानवता को कर्म, भक्ति और समर्पण का मार्ग प्रशस्त करते दिखते हैं।
