इश्क
उतरो ज़ेहन में..
सुन इश्क!
रफ्ता रफ्ता...
इस तरह कि..
जुदाई की तड़प में..
खुद को थोड़ा..
और पा सकूँ मैं!
है दर्द के..
अंजुमन में..
कुछ तो ओर भी..
ख्यालों को..
अपने एक पल..
खामोशी से ये..
समझा सकूँ मैं!
आ छोड़ के
जाने के लिए
फिर से मुझे तू!
इंतज़ार की
हद से गुज़र
बेहद के
आगोश में हूँ मैं!
ठहर कर..
देख तो ज़रा..
जुनूँ में ये..
कैसा सुकूँ है?
ये आज
तुझको..
बता सकूँ मैं।।

