होलिका के कर्म और स्वयं के दहन को उत्सव के रूप में मनाने और प्रहलाद के जीवंतता में धर्म और संस्कार को संजोए हुए पर्व होली
✍️धर्मेंद्र रस्तोगी (वरीय पत्रकार)
होलिका दहन में गोबर के उपले को इकट्ठा कर दहन करने की जो परंपरा चली आ रही है, उसे "होलिका" के कर्म और स्वयं के दहन को उत्सव के रूप में मनाने और प्रहलाद के जीवंतता में धर्म और संस्कार को संजोए हुए दिखाई पड़ता है। न जाने कितने वर्षों से मनाई जा रही इस परंपरा में प्रत्येक समाज के अपने- अपने रीति और रिवाज हैं। यह पर्व समाज को जोड़ने का काम करता है। प्रदेश से देश की ओर रुख करते सभी वर्गो का परिवार से मिलन का कारण है यह पर्व होली। बाजारों में रंग सजे दुकान पिचकारी, लिए बच्चों की अटखेलियों को रंगीन करता पर्व है यह होली।
रंग भंग, पकवानों और ना जाने कितने ही परंपराओं को जीवंत रखें भारतीय संस्कृति की आत्मा को रंगीन करता त्यौहार है होली पर्व। कितने प्रेम से छोटे- छोटे पिचकारियों को थामने के लिए उतावले हाथ जब बाजार की तरफ रुख करते हैं तो सारा बाजार रंगों की रंगोली सा प्रतीत होने लगता है। पकवानों की खुशबू से वातावरण सुरमई संगीत लिए बरबस ही हमें आकर्षित कर देता है। परदेश में बसे लोग इस आकर्षण और रंगों की रंगीनियों में घुलने के साथ अपनों से मिलने की चाहत लिए देश की ओर खिंचे चले आते हैं।
देश के कई प्रदेशों में अनूठे रूप में मनाने के लिए प्रसिद्ध है। जिसमें ब्रज की होली तो विश्व विख्यात है, जिसे करीब एक महीने पहले से मनाने की परंपरा आज भी लोगों को आकर्षित कर रही है। लट्ठमार होली, लड्डुओं की होली, फूलों की होली और न जाने कितने ही प्रकार से यह अपनी परंपरा को आज तक इस अंदाज से बयां कर रही है जैसा की वर्षों पहले किया होगा। पर्व है प्रेम का, भाईचारे का, अपनी संस्कृति को, अपने जड़ों से जोड़े रखने का, तो हमें चाहिए कि हम होली ऐसे मनाएं की हम अपने परंपरा को जीवंत रख सके।
हालांकि यह त्यौहार प्रेम सौहार्द भाईचारा और रिश्तो को मजबूत करने वाला है, किंतु वर्तमान समय में सामाजिक स्तर पर फैली कुछ अराजकताएं है, जो इसके सतरंगी रूप को कालिख के रूप में परिवर्तित करती जा रही है। भांग की ठंडाई को नशे का उदाहरण दिया जा रहा है, रंगों की पिचकारी और उसकी रंगीनियों को युवतियों के ऊपर सामूहिक अत्याचार के रूप में दर्शाया जा रहा है। क्या हमारी परंपराएं हमें यही शिक्षा देती हैं? हम इस भ्रम में जी रहे हैं कि हमने त्यौहार मनाया, लेकिन हम उस त्यौहार को कितने सौहार्दपूर्ण वातावरण से मना रहे हैं, कौन सी भावना से मना रहे हैं, इस पर अपने विचार और दृष्टिकोण को इस बात से दर्शाते हैं कि हमारे घर की बात नहीं है, जिनकी है वह समझेंगे।

