अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य, छठ महापर्व का तीसरा दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न
सारण (बिहार) संवाददाता धर्मेंद्र रस्तोगी: सारण जिला सहित राज्य और देश के विभिन्न हिस्सों में चार दिवसीय लोक आस्था के महापर्व छठ के तीसरे दिन सोमवार को व्रतियों ने अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित कर अपनी कठिन तपस्या के महत्वपूर्ण चरण को पूर्ण किया। 36 घंटे के निर्जला उपवास का पालन कर रहे व्रती दिनभर पूजा-अर्चना में लीन रहे और संध्या होते ही छपरा शहर के दक्षिणी एवं पश्चिमी छोर पर स्थित सरयू नदी, पूर्वी क्षेत्र में गंडक नदी, गंगा नदी तथा विभिन्न तालाबों और कुओं के घाटों पर पहुंचकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया। छठ पर्व के इस दिन को ‘संध्या अर्घ्य’ के रूप में जाना जाता है, जिसे पूरे व्रत का सबसे अहम पड़ाव माना जाता है।
इससे पूर्व व्रतियों ने ‘खरना’ के दिन देर रात गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण कर निर्जला उपवास की शुरुआत की थी। इसके बाद से व्रती पूरी शुद्धता, नियम और श्रद्धा के साथ भगवान सूर्य की आराधना में जुटे हुए हैं, जो इस पर्व की कठोर साधना और अनुशासन को दर्शाता है।
सोमवार की संध्या छपरा शहर से मांझी, ताजपुर, एकमा, रिवीलगंज लेकर ग्रामीण इलाकों के सैकड़ों घाटों पर आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। छठ गीतों की मधुर गूंज, दीपों की जगमगाहट और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। महिलाएं और पुरुष अपने-अपने सिर पर सूप और टोकरी में प्रसाद लेकर घाटों तक पहुंचे और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया।
इस दौरान जिला प्रशासन द्वारा भी सुरक्षा और स्वच्छता के व्यापक इंतजाम किए गए थे। प्रमुख घाटों के साथ-साथ मोहल्लों और गांवों में अस्थायी घाटों का निर्माण कराया गया, वहीं स्थानीय लोगों ने भी स्वयं आगे बढ़कर घाटों की सफाई और व्यवस्था में सहयोग किया, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
रात्रि में छठ व्रती ‘कोसी भरने’ की परंपरा का निर्वहन करेंगे, जिसमें दीप प्रज्वलित कर भगवान सूर्य और छठी मैया की आराधना की जाती है। यह परंपरा परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की मंगल कामना के लिए निभाई जाती है। मंगलवार की सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही इस महाव्रत का विधिवत समापन होगा।

