जहाँ चाह, वहाँ राह (कहानी)
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कटिहार, बिहार
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शहर की तंग गलियों का मुहल्ला हुसैन पूर । यहाँ के अधिकतर बाशिंदे मुसलमान थे ।तंग गालियों के अंदर कई गलियारे थे। इस मुहल्ले में अधिकतर गरीबी से गुजर -बसर करने वाले लोग रहा करते थे। अधिकार घर में बच्चों और जवानों की संख्या अधिक थी अर्थात् लोग गर्मी के दिनों में मुश्किल से सो पाते थे तो कुछ लोग बाहर सड़क के किनारे एक शेड में सो लिया करते थे। जनसंख्या इतनी कि मुहल्ले का संसाधन कम पड़ जाता था और मुहल्ले में शिक्षा एवं सफाई का स्तर बहुत निम्न था। रिक्शा वाला, खोमचा वाला इत्यादि छोटे मोटे व्यापार करने वाले लोग की संख्या अधिक थी। कुछ संभ्रांत लोगों भी थे लेकिन वो अन्य लोगों से उलझते नहीं थे।
बशीर मास्टर इस मुहल्ले की सभी गलियों से चिर परिचित थे क्योंकि इस मुहल्ले के मध्य विद्यालय में पिछले दस वर्षों से अध्यापक थे और पिछले तीन वर्षों से प्रधान शिक्षक थे। बशीर साहब मुहल्ले की गंदगी और पढ़ाई से ड्रॉप आउट को लेकर चिंतित रहते थे और कई असफल प्रयास भी कर चुके थे. एकदिन बहुत ही भारी मन से उन्होंने शीला अपनी सहयोगी शिक्षक से कहा " ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे " ऐसा कहते हुए उन्होंने विद्यालय परिसर में फैली हुई गंदगी साफ करना शुरू किया। विद्यालय के अन्य कनीय सहयोगियों ने भी सहयोग किया लेकिन शीला को बात चुभ गई। उसने समस्या पर गहनता से सोचना शुरू किया और मुहल्ले की गंदगी पर भी गंभीरता से बिचार किया। दो दिनों बाद शीला बोली " सर क्या हमलोग गंदगी की समस्या पर समेकित बिचार कर सकते है?" "मतलब? " बशीर साहब पूछे ।" मतलब यह कि गंदगी तो बच्चों को संस्कार और। माहौल से मिली है तो हम केवल विद्यालय को स्वयं साफ कर बचों को जागरूक नागरिक बना सकते हैं? .. अगर नहीं तो हमे कुछ और करना होगा "। "आप क्या सोचतीं है विस्तार से मुझे लिजर घंटी में बताइयेगा।" बशीर ने शीला को कहा और शीला वर्ग में चलीं गईं।
तीसरी घंटी में शीला ने बशीर को अपना प्रस्ताव दिया। उसने बताया कि पर्यावरण मोनिटर और पर्यावरण एंबेसडर नामक दो प्रकार के बचो का चयन वर्ग छह से उपर के प्रत्येक सेक्शन में प्रतियोगिता के आधार पर किया जाय और चुने हुए बचो को विद्यालय की कक्षा के बाद कुछ दिनो तुक पर्यावरण संरक्षण की विशेष प्रशिक्षण देकर समाज में भी हम विशेष लोगों के सहयोग से जागरुकता फैला सकते हैं।
बशीर सहाब ने सुना लेकिन कुछ नही बोले। शीला थोड़ी मायूस हुई। दोनों अपने अपने काम में लग गये।
दूसरे दिन बशीर ने शीला को बुलाया और विस्तृत चर्चा की। फिर दोनों ने सोचा कि इसमें फिरदौस, रमेश और प्रवीण से भी बात करनी चाहिए। इसलिए उन दोनों ने छुट्टी के बाद रुकने के लिए इन्हें भी कहा। छुट्टी के बाद पांच लोग बैठे और दो घण्टे की परस्पर संवाद के बाद कुछ करते योजना तैयार हो पाई जिसमें शिक्षा समिति के अध्यक्ष और सचिव से बात कर विश्वास में लेना आगे बढ़ने की पहली शर्त मानी गई।
पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शीला और बशीर दूसरे दिन शिक्षा समिति के अध्यक्ष के घर संध्या समय गए औऱ उनसे अपनी बात बताई। सचिव उस्मान एक सुलझे हुए इंसान थे उन्होंने तुरंत हामी भरी और अध्यक्ष रहमतुल्ला जी को भी सहमत कर लिया। धीरे धीरे बात आगे बढ़ गई और सफलता की आस में शीला उत्साहित होने लगी। तय कार्यक्रम के अनुसार अब क्रियान्वयन की बारी थी। अतः पुख्ता प्लान कर इसकी सूचना प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी को भी दी गई और अनुमति के उपरांत विधिवत सूचना बच्चो को दी गई। विद्यालय में कुछ ऐसे भी शिक्षक थे जिन्हें यह पहल रास नही आ रही थी। शिखा, आफरीन, मुस्तफा, तो इस पहल से जैसे चिढ़ ही गए थे।
वर्ग में कार्यक्रम की सूचना छात्रों को दी गई। प्रतियोगिता आयोजन का दायित्व शीला को दिया गया और अन्य तीन लोग उनका सहयोग करेंगे ऐसा तय हुआ। बशीर तो विद्यालय परिवार के प्रधान शिक्षक थे अतः उनकी अगुआई में ही कार्यकम होना था।
वर्ग छः से वर्ग आठ तक कुल छः सेक्शन और बारह छात्र चयनित हुए। इन छात्रों को पूर्वनिर्धारित योजना के अनुरूप पर्यावरण संरक्षण हेतु जागरूक किया गया और साथ ही नागरिक कर्तव्य और स्वच्छता के बारे में विशेष जानकारी दी गई। इस प्रकार इन चुने हुए छात्रों को प्रार्थना सत्र मे बुलाकर नगर के गणमान्य लोगों और प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी से प्रमाण पत्र एवं मोमेंटो प्रदान किया गया। छात्रों के उत्साह का ठिकाना नही था। इनमें से दो दो छात्रों को सप्ताह के एक दिन परिसर की सफाई का दायित्व दिया जाने लगा जो अपने सेक्शन के छात्रों के सहयोग से परिसर साफ किया करते थे। इस प्रकार परिसर साफ रहने लगा।
अब मुहल्ले में क्रांति लाने की बारी थी। सभी शिक्षकों ने मिलकर तय किया कि शनिवार के दिन स्वच्छता जागरूकता अभियान के तहत रैली निकालकर मुहल्ले का भ्रमण करेंगे। तत्पश्चात मुहल्ले वालों के सहयोग से स्वच्छता अभियान चला कर मुहल्ले में साफ सफाई की व्यवस्था करेंगे। इसमें बाधा नहीं आ जय इस हेतु सचिव और अध्यक्ष रहमतुल्ला जी एवं अन्य को साथ लेकर काम करने की योजना बनाई गई।
इस योजना पर क्रमशः अमल किया गया और कुल दो महीने बाद मोहल्ला और विद्यालय परिसर बिल्कुल साफ सुथरा रहने लगा। बशीर साहब शीला के इस पहल और सतत प्रयास को सराहते नहीं थकते और उन्होंने शीला के लिए प्रार्थना सभा में सभी गणमान्य लोगों के बीच कहा कि यदि शीला जी ने पहल नहीं की 9होती और हमने प्रयास नहीं किया होता तो इस विद्यालय और समाज मे इतना बड़ा परिवर्तन नही हुआ होता। किसी ने सच ही कहा है " जहां चाह, वहां राह"।

