फाल्गुन पूर्णिमा पर खास संयोग, धुरखेल से होली तक जानें तिथि- मुहूर्त
फाल्गुन पूर्णिमा का पर्व आस्था, ज्योतिष और परंपरा का विशेष संयोग:
✍️धर्मेंद्र रस्तोगी
होली को लेकर शहर से लेकर गांव तक उत्साह बढ़ते जा रहा है। शहरी क्षेत्रों सहित ग्रामीण बाजारों में रंग, गुलाल, पिचकारी और अबीर की दुकाने सजनी लगी है। गांव या शहर से बाहर रहकर नौकरी या पढ़ाई करने वाले लोग भी अपने घरों की ओर लौटने के लिए दिन गिन रहे हैं। जिस कारण चारों तरफ़ उत्सवी माहौल दिख रहा है। इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा का पर्व आस्था, ज्योतिष और परंपरा के विशेष संयोग के कारण और भी खास माना जा रहा है। होलिका दहन, सुतक और खंडग्रस्त चंद्रग्रहण एक ही दिन पड़ने से धार्मिक दृष्टि से इसकी महत्ता बढ़ गई है।
इस संबंध में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय काशी विद्यापीठ के शोधार्थी सह ज्योतिषाचार्च राकेश कुमार मिश्रा ने बताया कि इस वर्ष 03 मार्च, मंगलवार को पूर्णिमा अपराह्न 4:26 बजे तक रहेगी। शास्त्रों के अनुसार सूर्योदय से 48 मिनट पूर्व होलिका दहन करना श्रेष्ठ माना गया है। हालांकि स्थानीय परंपरा के अनुसार शुभ मुहूर्त यानी रात्रि में होलिका दहन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि सूर्योदय के बाद कुल परंपरा के अनुसार कुलदेवता पर सिंदूर आरोपण, पातरि तथा अन्य विधि- विधानों का पालन किया जाएगा। ठाकुर पंचांग के अनुसार होलिकाभस्म धारण, जिसे धुरखेल कहा जाता है, का विशेष महत्व है।
होलिका दहन के अगले दिन प्रातः भस्म लगाकर सचैल स्नान करने की परंपरा है। इसके बाद लोग रंग- गुलाल से होली खेलते हैं। इसी दिन सप्तडोरक बंधन, जिसे डोरा पर्व भी कहा जाता है, संपन्न होगा। यह पर्व रक्षा, सुख समृद्धि और मंगलकामना का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि 3 मार्च को प्रातः 10 बजे तक पूर्णिमा से जुड़े सभी कृत्य संपन्न कर लेना उचित रहेगा। सायं 5:55 बजे से 6:46 बजे तक खंडग्रस्त चंद्रग्रहण रहेगा। यद्यपि ग्रहण का आरंभ भारत में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देगा, क्योंकि उस समय दिन रहेगा, किंतु ग्रहणयुक्त चंद्र का उदय होगा। ग्रहण का मोक्ष 6:48 बजे बताया गया है। ग्रहण का सुतक आठ घंटे पूर्व, यानी प्रातः 9:50 बजे से प्रभावी हो जाएगा। इस अवधि में मंदिरों के पट बंद रहेंगे और शुभ कार्य वर्जित माने जाएंगे।
हृषिकेश, महावीर, मिथिला तथा वैदिक पंचांगों के अनुसार रंगोत्सव 4 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि फाल्गुन पूर्णिमा के बाद चैत्र मास का प्रथम चरण आरंभ होता है, जो भारतीय नववर्ष की शुरूआत का संकेत देता है। पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्य कश्यप की बहन होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान था। उसने भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का प्रयास किया, किंतु भगवान की कृपा से होलिका भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। यह घटना बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।
इस प्रकार इस वर्ष की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, ज्योतिषीय गणना और पारंपरिक मान्यताओं के अद्भुत संयोग का प्रतीक बनकर आई है। होलिका की अग्नि में अहंकार और नकारात्मकता की आहुति देकर तथा भस्म से मन की शुद्धि कर जब रंगों की फुहार उठेगी, तो वह जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संदेश भी देगी।
होलिका दहन पर इन बातों का रखें ध्यान:
होलिका दहन सदैव शुभ मुहूर्त और प्रदोष काल में करें। दहन स्थल पर साफ-सफाई और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें। अग्नि प्रज्वलित करते समय सूखी लकड़ी और गोबर के उपलों का ही प्रयोग करें। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्लास्टिक या रबर सामग्री न जलाएं। दहन के बाद अग्नि की पूरी तरह शांति सुनिश्चित करें।
धार्मिक दृष्टि से फाल्गुन पूर्णिमा के बाद चैत्र मास का आरंभ होता है, जिसे भारतीय नववर्ष का प्रारंभिक संकेत भी माना जाता है। इस प्रकार होली 2026 केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सामाजिक समरसता का पर्व है। धुरखेल से लेकर रंगोत्सव तक यह त्योहार जीवन में उल्लास और नई ऊर्जा का संचार करता है।
होलिका दहन का निर्णय:
फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष चतुर्दशी सोमवार 02 मार्च को शाम के 5: 57 मिनट पर चतुर्दशी तिथि समाप्त हो रही है। उसके बाद पूर्णिमा तिथि प्रदोष काल में प्रवेश कर रही है। अतः 02 मार्च को शाम 06: 39 से रात्रि के 09 बजे तक प्रदोष काल में होलिका दहन करना श्रेष्ठ रहेगा। क्योंकि दूसरे दिन 03 मार्च को पूर्णिमा तिथि प्रदोषकाल से पूर्व ही समाप्त हो रहा है। साथ ही चंद्र ग्रहण भी है। जिस कारण होलिका दहन करना शुभ नहीं माना गया है।

