नारी का श्रृंगार क्या है?
/// जगत दर्शन न्यूज
आज मैं वह सच सबके सामने रखना चाहती हूँ, जो मेरे विचारों में मुझे स्वयं से प्रश्न करने पर मजबूर कर देता है कि नारी का श्रृंगार आखिर क्या है? क्या नारी शक्ति केवल कोमलता और वात्सल्य के भाव तक ही सिमटी हुई है, या वह उससे आगे बढ़कर अपने सपनों का भी श्रृंगार कर सकती है? यदि एक पहलू से देखा जाए तो महिलाएँ घर और बच्चों को संभालने में ही पर्याप्त समझी जाती हैं, लेकिन क्या उनके सपनों और कुछ कर दिखाने की चाह को इस तरह उनके भीतर दफन कर देना उचित है?
पहले भी महिलाओं को वह बराबरी नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी। यह मैं स्वीकार करती हूँ कि समाज की सोच में काम और कर्तव्य पहले से ही अलग-अलग गढ़ दिए गए हैं, लेकिन यह कहाँ लिखा है कि वह सोच अब बदली नहीं जा सकती? क्या स्त्री घर के साथ अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभा सकती? फिर क्यों यह धारणा है कि लड़कियाँ यह नहीं कर सकतीं, वह नहीं कर सकतीं? कभी यह सोचिए कि यदि एक लड़की चाहे तो वह क्या कुछ नहीं कर सकती—वह भी मर्यादा और संस्कार में रहकर। यदि आप दस कदम आगे बढ़ रहे हों, तो नारी को भी दस कदम आगे साथ लेकर बढ़िए न। क्यों हम एक नारी से केवल मेकअप की ही उम्मीद करते हैं? क्या वह आपकी बराबरी का श्रृंगार नहीं बन सकती? क्या वह आपका सहारा बनने वाला श्रृंगार नहीं हो सकती?
आप स्वयं से यह प्रश्न कीजिए—यदि एक नारी आपकी तरह अपने सपने पूरे करने लगे, तो क्या देश और समाज की उन्नति नहीं होगी? अवश्य होगी। एक पुरुष यदि महिला से प्रेम कर सकता है, तो उसके सपनों को पूरा करने में उसका साथ दे सकता है, हर कठिनाई में उसका हाथ थाम सकता है। एक बदलाव ही नए विचारों पर सोचने की क्षमता देता है। हमें यह बताना होगा कि नारी शक्ति अब जागे और अपने स्वाभिमान के लिए खड़ी होकर लड़े। जो पुरुष शिक्षित होगा, वह निश्चित ही हर नारी को चार कदम आगे बढ़ाने में मदद करेगा।
इक्कीसवीं सदी में महिलाएँ निरंतर अपने कदम आगे बढ़ा रही हैं—चाहे स्वतंत्रता संग्राम में लक्ष्मीबाई हों, देश की राष्ट्रपति हों, साहित्य में महादेवी वर्मा हों या खेल के मैदान में हरमनप्रीत। ऐसे अनगिनत क्षेत्रों से महिलाएँ उभर रही हैं और समृद्धि की दस्तक दे रही हैं। इनका स्वागत कीजिए, न कि दुत्कार।
माना कि आप अच्छा कर रहे हैं, लेकिन वही अच्छा हम नारी शक्ति भी कर सकते हैं और कर भी रहे हैं। नारी के भीतर बचपन से यह बीज बो दिए जाते हैं कि तुम यह नहीं कर सकती, तुम सवाल-जवाब नहीं कर सकती, तुम चुप रहो और केवल घर का काम करो। ऐसी नारी अपने अंतर्मन में छिपे विचारों, शब्दों और सपनों को साकार करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाती, क्योंकि उसे लगता है कि उसका साथ देने वाला कोई नहीं है। लेकिन अब रुकिए—नारी को आज किसी सहारे की बैसाखी नहीं ढूंढनी है, बल्कि अपने हौसले और स्वाभिमान के लिए लड़ना है और जीतना भी है। यह केवल कह देने से नहीं होगा, बल्कि इसके लिए हजारों मुश्किलों से जूझना पड़ेगा।
मैंने सेना में कार्यरत महिला अधिकारियों को सुना है—उनसे सीखिए कि पहचान कैसे बनाई जाती है और स्वयं को आगे कैसे लाया जाता है। हमें भी अपने व्यक्तित्व की चमक से रोशन होना है। स्वयं को समझकर आत्मनिर्भर बनना, स्वाभिमान के हित में खड़ा होना और ईमानदारी की वही चमक हमें आगे ले जाती है।
बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मेरे विचारों को पढ़ा और अपने मन में बदलाव का एक बीज बोया। इसके लिए मैं आपकी आभारी रहूँगी।
— नीतू नागर
लेखिका एवं कवयित्री
अंबर, नरसिंहगढ़, मध्यप्रदेश


